Akhilesh Yadav Politics | सत्ता, पहचान और बदलती राजनीति : अखिलेश यादव पर उठते प्रश्न और उत्तर प्रदेश का नया राजनीतिक समीकरण
राजनीतिक परिवर्तन के दौर में विचार, विमर्श और जनविश्वास की नई कसौटी | Akhilesh Yadav Politics
सम्पादकीय : सीतेश चौधरी
उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है। इस बार कारण केवल कोई चुनाव, राजनीतिक गठबंधन अथवा सत्ता परिवर्तन की संभावना नहीं है, बल्कि राजनीतिक भाषा, धार्मिक विमर्श, सामाजिक पहचान और जनमत निर्माण की बदलती प्रक्रिया है। हाल के दिनों में सामाजिक माध्यमों पर तीव्र गति से प्रसारित हुए एक चल-चित्र और उससे जुड़ी राजनीतिक टिप्पणियों ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। इस बहस में उनके पुराने वक्तव्यों, समाजवादी राजनीति की विरासत, राम मंदिर, सांस्कृतिक पहचान, हिंदुत्व, सामाजिक न्याय और मतदाता समूहों की राजनीति जैसे अनेक विषय एक साथ सामने आए हैं। यह स्थिति केवल किसी एक नेता के राजनीतिक भविष्य का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक परिवर्तन का संकेत भी है जिससे आज भारतीय लोकतंत्र और विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति गुजर रही है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं हैं। प्रत्येक चुनाव के समय पुराने वक्तव्य, पूर्व निर्णय और राजनीतिक इतिहास को नए संदर्भों में प्रस्तुत किया जाता है। किंतु किसी भी लोकतांत्रिक समाज में यह आवश्यक है कि राजनीतिक दावों को अंतिम सत्य मान लेने के स्थान पर उनके पीछे छिपे तथ्य, परिस्थितियाँ और राजनीतिक उद्देश्य को समझने का प्रयास किया जाए। लोकतंत्र केवल भावनाओं पर नहीं चलता, बल्कि वह विवेक, तर्क और जागरूक नागरिक सहभागिता पर आधारित होता है। इसलिए किसी भी राजनीतिक विमर्श का मूल्यांकन करते समय केवल भाषणों या प्रचार सामग्री के आधार पर निष्कर्ष निकालना लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।
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उत्तर प्रदेश की राजनीति का बदलता स्वरूप | Akhilesh Yadav Politics
उत्तर प्रदेश लंबे समय तक सामाजिक संरचना पर आधारित राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता रहा है। यहाँ चुनावी समीकरण प्रायः जातीय और सामाजिक समूहों के आधार पर निर्मित होते रहे। विभिन्न राजनीतिक दलों ने समय-समय पर अलग-अलग वर्गों को अपने साथ जोड़ने के लिए विशेष रणनीतियाँ अपनाईं। यही कारण था कि प्रदेश की राजनीति में सामाजिक समीकरणों का प्रभाव लंबे समय तक निर्णायक बना रहा।
किन्तु पिछले एक दशक में राजनीतिक परिस्थितियों में उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाई देता है। अब केवल सामाजिक पहचान ही चुनावी निर्णय का आधार नहीं रह गई है। राष्ट्रहित, सांस्कृतिक अस्मिता, विकास, सुशासन, कल्याणकारी योजनाएँ, सुरक्षा, आधारभूत संरचना और प्रशासनिक क्षमता जैसे विषय भी मतदाताओं की प्राथमिकताओं में प्रमुख स्थान प्राप्त कर चुके हैं। इस परिवर्तन ने लगभग प्रत्येक राजनीतिक दल को अपनी रणनीति और अपने सार्वजनिक विमर्श में परिवर्तन करने के लिए बाध्य किया है। अब केवल परंपरागत मतदाता समूहों पर निर्भर रहना किसी भी दल के लिए पर्याप्त नहीं माना जाता।
इसी बदलते परिवेश में समाजवादी पार्टी सहित सभी विपक्षी दलों के सामने नई राजनीतिक चुनौतियाँ खड़ी हुई हैं। उन्हें अपने पारंपरिक आधार को बनाए रखते हुए उन मतदाताओं तक भी पहुँचना पड़ रहा है जिनकी प्राथमिकताएँ पहले की तुलना में बदल चुकी हैं। यही कारण है कि राजनीतिक भाषा, प्रतीकों और सार्वजनिक व्यवहार में भी परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
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क्या केवल पहचान की राजनीति पर्याप्त है? | Akhilesh Yadav Politics
भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक पहचान की भूमिका कभी समाप्त नहीं हुई है और निकट भविष्य में उसके समाप्त होने की संभावना भी नहीं दिखाई देती। समाज की विविधता स्वयं इस तथ्य का प्रमाण है कि विभिन्न सामाजिक समूह अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं और अपेक्षाओं के साथ राजनीति में भागीदारी करते हैं। किंतु आज स्थिति यह है कि केवल जाति अथवा धर्म के आधार पर चुनावी सफलता सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
आज का मतदाता पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक है। वह केवल यह नहीं देखता कि कोई नेता किस सामाजिक समूह का प्रतिनिधित्व करता है, बल्कि यह भी देखता है कि उसके नेतृत्व में शासन की गुणवत्ता कैसी रही, विकास की गति क्या रही, प्रशासन कितना उत्तरदायी रहा और सार्वजनिक जीवन में उसकी विश्वसनीयता कितनी है। यही कारण है कि राजनीतिक दलों को अब केवल सामाजिक समीकरणों पर नहीं, बल्कि अपने कार्य, दृष्टि और नेतृत्व क्षमता पर भी जनता का विश्वास अर्जित करना पड़ता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि आधुनिक राजनीति में पहचान अब केवल सामाजिक वास्तविकता नहीं रही, बल्कि अनेक बार उसे राजनीतिक साधन के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता है। ऐसी स्थिति में नागरिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे भावनात्मक अपील और वास्तविक तथ्यों के बीच संतुलन स्थापित कर सकें। लोकतंत्र की सफलता इसी पर निर्भर करती है कि मतदाता भावनाओं के साथ-साथ विवेक का भी उपयोग करे।
अखिलेश यादव की राजनीतिक यात्रा और वर्तमान चुनौती | Akhilesh Yadav Politics
अखिलेश यादव ने स्वयं को समाजवादी राजनीति की नई पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में विकास, आधुनिक आधारभूत संरचना, सामाजिक न्याय और युवा नेतृत्व जैसे विषयों को प्रमुखता दी। समय-समय पर उन्होंने विभिन्न सामाजिक वर्गों को साथ लेकर चलने की बात भी कही और अपने राजनीतिक अभियान में नए सामाजिक समीकरणों को स्थान देने का प्रयास किया।
इसके साथ ही सार्वजनिक जीवन में उनके व्यवहार और धार्मिक स्थलों पर उनकी उपस्थिति ने भी यह संकेत दिया कि वे अपनी राजनीतिक छवि को व्यापक बनाने का प्रयास कर रहे हैं। राजनीति में छवि परिवर्तन कोई असामान्य घटना नहीं है। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं और राजनीतिक दल भी अपनी रणनीतियों में परिवर्तन करते हैं। किंतु यही परिवर्तन विरोधियों के लिए प्रश्न उठाने का अवसर भी बन जाता है।
विरोधी दल यह प्रश्न उठाते हैं कि यदि वर्तमान राजनीतिक भाषा और पूर्व वक्तव्यों के बीच अंतर दिखाई देता है, तो उसके पीछे वास्तविक कारण क्या है। क्या यह विचारधारा का स्वाभाविक विकास है अथवा बदलती चुनावी परिस्थितियों के अनुरूप अपनाई गई रणनीति? यही प्रश्न वर्तमान राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बना हुआ है। दूसरी ओर समर्थकों का तर्क है कि समाज और राजनीति निरंतर परिवर्तनशील हैं, इसलिए किसी भी नेता का समय के साथ अपनी प्राथमिकताओं में परिवर्तन करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है।
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विचारधारा और चुनावी आवश्यकता के बीच संतुलन | Akhilesh Yadav Politics
भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि लगभग प्रत्येक राजनीतिक दल ने समय-समय पर अपनी रणनीति में परिवर्तन किया है। परिस्थितियाँ बदलने पर राजनीतिक भाषा बदलती है, चुनावी प्राथमिकताएँ बदलती हैं और जनसंपर्क के तरीके भी बदल जाते हैं। किंतु जनता सदैव यह जानना चाहती है कि परिवर्तन केवल चुनावी लाभ प्राप्त करने के लिए किया गया है या उसके पीछे कोई व्यापक वैचारिक दृष्टि भी है।
यही कारण है कि आज राजनीतिक दलों के लिए केवल नए नारे देना पर्याप्त नहीं रह गया है। उन्हें अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच निरंतरता भी स्थापित करनी पड़ती है। यदि जनता को यह विश्वास हो जाए कि परिवर्तन स्वाभाविक और विचार आधारित है, तो वह उसे स्वीकार कर लेती है। किंतु यदि परिवर्तन केवल अवसरवाद के रूप में दिखाई देता है, तो वही परिवर्तन राजनीतिक विवाद का कारण बन जाता है।
उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीति में भी यही स्थिति दिखाई देती है। एक ओर राजनीतिक दल अपने पारंपरिक मतदाता आधार को सुरक्षित रखना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर वे नए सामाजिक वर्गों का विश्वास भी प्राप्त करना चाहते हैं। इस संतुलन को साधना किसी भी दल के लिए आसान नहीं है, क्योंकि प्रत्येक नया कदम पुराने राजनीतिक इतिहास के संदर्भ में परखा जाता है।
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सामाजिक माध्यमों ने बदल दिया चुनावी संवाद का स्वरूप | Akhilesh Yadav Politics
एक समय था जब चुनावी प्रचार का सबसे प्रभावी माध्यम सार्वजनिक सभाएँ, समाचार पत्र और रेडियो हुआ करते थे। उसके बाद दूरदर्शन और निजी समाचार माध्यमों का प्रभाव बढ़ा। आज परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल चुकी हैं। अब किसी भी राजनीतिक दल का संदेश कुछ ही क्षणों में करोड़ों लोगों तक पहुँच सकता है। एक छोटा-सा चल-चित्र, एक चित्र, एक संक्षिप्त संदेश अथवा कोई पुराना भाषण देखते ही देखते व्यापक चर्चा का विषय बन जाता है। यही कारण है कि चुनावी राजनीति अब केवल मैदानों में होने वाली सभाओं तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वह अंकीय मंचों पर भी समान रूप से लड़ी जा रही है।
सामाजिक माध्यमों ने सूचना के प्रसार को अत्यंत तीव्र बना दिया है। इसके अनेक सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। नागरिकों को अब किसी एक माध्यम पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। वे विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और अनेक दृष्टिकोणों को समझने का अवसर मिलता है। दूसरी ओर यही माध्यम अपुष्ट सूचनाओं, भ्रामक दावों और भावनात्मक प्रचार का भी साधन बन जाते हैं। इसलिए आज प्रत्येक नागरिक के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि वह किसी भी सूचना को सत्य मानने से पहले उसके स्रोत और प्रमाण की जाँच अवश्य करे।
राजनीतिक दल भी इस परिवर्तन को भली-भाँति समझ चुके हैं। अब चुनावी रणनीति केवल भाषणों या घोषणापत्र तक सीमित नहीं रहती। प्रत्येक संदेश की भाषा, प्रस्तुति, समय और प्रसार की गति पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यही कारण है कि आज चुनाव केवल विचारों की प्रतिस्पर्धा नहीं रह गए हैं, बल्कि प्रभावी संवाद और जनमत निर्माण की प्रतिस्पर्धा भी बन चुके हैं।
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प्रचार-पत्रों और प्रतीकों की बदलती शक्ति | Akhilesh Yadav Politics
भारतीय राजनीति में प्रचार-पत्रों और प्रतीकों का महत्व सदैव रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर वर्तमान समय तक राजनीतिक संदेशों को जनसामान्य तक पहुँचाने में इनका विशेष योगदान रहा है। अंतर केवल इतना आया है कि पहले प्रचार-पत्र नगरों और गाँवों की दीवारों पर दिखाई देते थे, जबकि आज वही संदेश अंकीय माध्यमों के माध्यम से प्रत्येक नागरिक के हाथ में पहुँच जाता है।
एक प्रभावशाली नारा, एक सशक्त चित्र अथवा कुछ शब्दों में व्यक्त किया गया राजनीतिक संदेश कई बार लंबे भाषणों से अधिक प्रभाव उत्पन्न कर देता है। यही कारण है कि वर्तमान समय में राजनीतिक दल अपने प्रचार को अधिक सरल, संक्षिप्त और भावनात्मक बनाने का प्रयास करते हैं। उनका उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं होता, बल्कि मतदाता के मन में एक विशेष धारणा स्थापित करना भी होता है।
यहीं से राजनीतिक संचार की वास्तविक चुनौती प्रारंभ होती है। यदि प्रचार तथ्यों और उत्तरदायित्व पर आधारित हो तो वह लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाता है। किंतु यदि उसका उद्देश्य केवल भ्रम उत्पन्न करना अथवा समाज में विभाजन पैदा करना हो, तो वही लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन जाता है।
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राजनीति में अतीत का महत्व क्यों बना रहता है | Akhilesh Yadav Politics
लोकतंत्र में सार्वजनिक जीवन अत्यंत पारदर्शी होता जा रहा है। आज किसी भी नेता का वर्षों पुराना वक्तव्य, भाषण या सार्वजनिक घोषणा कुछ ही क्षणों में पुनः सामने लाई जा सकती है। अंकीय अभिलेखों के इस युग में राजनीतिक स्मृति पहले की तुलना में कहीं अधिक दीर्घकालिक हो गई है। इसलिए प्रत्येक राजनीतिक दल और प्रत्येक नेता को यह ध्यान रखना पड़ता है कि उसका प्रत्येक सार्वजनिक वक्तव्य भविष्य में भी उसके साथ जुड़ा रहेगा।
अखिलेश यादव के संदर्भ में भी यही स्थिति देखने को मिलती है। उनके समर्थक वर्तमान राजनीतिक दृष्टिकोण को समयानुकूल परिवर्तन मानते हैं, जबकि विरोधी उनके पुराने वक्तव्यों का उल्लेख कर यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या वर्तमान और अतीत के बीच कोई वैचारिक अंतर दिखाई देता है। यही लोकतांत्रिक राजनीति का स्वाभाविक स्वरूप है, जहाँ प्रत्येक सार्वजनिक निर्णय और प्रत्येक वक्तव्य समय-समय पर पुनः मूल्यांकन का विषय बनता है।
वास्तव में यह स्थिति केवल किसी एक नेता तक सीमित नहीं है। लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों और उनके शीर्ष नेतृत्व को समय-समय पर अपने पूर्व निर्णयों और वर्तमान नीतियों के बीच सामंजस्य स्थापित करना पड़ता है। लोकतंत्र में जनता का विश्वास उसी नेतृत्व को प्राप्त होता है जो अपने विचारों और निर्णयों को स्पष्टता तथा उत्तरदायित्व के साथ प्रस्तुत कर सके।
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विपक्ष के सामने बदलती राजनीतिक चुनौती | Akhilesh Yadav Politics
उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन यह दिखाई देता है कि सत्तापक्ष ने अपने राजनीतिक विमर्श को अपेक्षाकृत स्पष्ट रूप से स्थापित किया है। सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रीय सुरक्षा, विकास और कल्याणकारी योजनाओं जैसे विषय उसके सार्वजनिक संवाद का प्रमुख आधार बने हुए हैं। इसके विपरीत विपक्ष के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह एक ऐसी साझा राजनीतिक दृष्टि प्रस्तुत करे जो विविध सामाजिक समूहों को समान रूप से आकर्षित कर सके।
विभिन्न विपक्षी दल अपनी-अपनी राजनीतिक परिस्थितियों और क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार रणनीति बना रहे हैं। स्वाभाविक रूप से उनकी प्राथमिकताओं में भी अंतर दिखाई देता है। यही कारण है कि कई बार विपक्ष का सामूहिक संदेश उतनी स्पष्टता से जनता तक नहीं पहुँच पाता जितना किसी एक संगठित राजनीतिक अभियान का संदेश पहुँचता है।
समाजवादी पार्टी भी इसी व्यापक राजनीतिक परिस्थिति का हिस्सा है। उसे अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को सुरक्षित रखते हुए नए मतदाताओं का विश्वास भी अर्जित करना है। यह कार्य केवल चुनावी घोषणाओं से संभव नहीं है। इसके लिए दीर्घकालिक वैचारिक स्पष्टता, विश्वसनीय नेतृत्व और सतत जनसंपर्क की आवश्यकता होती है।
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आज का मतदाता पहले से अधिक जागरूक है | Akhilesh Yadav Politics
समय के साथ भारतीय मतदाता की राजनीतिक समझ में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। वह अब केवल चुनावी भाषणों पर निर्भर नहीं रहता। वह विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त करता है, विभिन्न दलों के दावों की तुलना करता है और अपने अनुभवों के आधार पर निर्णय लेने का प्रयास करता है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सूचना तक पहुँच पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सरल हो चुकी है।
यद्यपि सूचना की अधिकता अपने साथ भ्रम की संभावना भी लेकर आती है, फिर भी यह लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है कि नागरिक अब अधिक प्रश्न पूछ रहे हैं। वे केवल वादों से संतुष्ट नहीं होते, बल्कि उनके क्रियान्वयन की भी समीक्षा करते हैं। यही लोकतंत्र की परिपक्वता का सबसे महत्वपूर्ण संकेत है।
आज मतदाता विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और प्रशासनिक दक्षता जैसे विषयों को भी उसी गंभीरता से देखता है जिस गंभीरता से वह सामाजिक और सांस्कृतिक प्रश्नों पर विचार करता है। यही परिवर्तन राजनीतिक दलों को भी अपनी प्राथमिकताओं का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए प्रेरित कर रहा है।
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लोकतंत्र में उत्तरदायित्व केवल नेताओं का नहीं होता | Akhilesh Yadav Politics
लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता केवल राजनीतिक दलों पर निर्भर नहीं करती। समाचार माध्यमों, सामाजिक माध्यमों, नागरिक संगठनों और स्वयं मतदाताओं की भूमिका भी समान रूप से महत्वपूर्ण होती है। यदि सार्वजनिक विमर्श तथ्यों, प्रमाणों और संतुलित दृष्टिकोण पर आधारित होगा, तभी लोकतंत्र स्वस्थ दिशा में आगे बढ़ सकेगा।
समाचार माध्यमों का दायित्व केवल घटनाओं का प्रसारण करना नहीं है, बल्कि तथ्यों की निष्पक्ष जाँच करना भी है। उसी प्रकार सामाजिक माध्यमों का उपयोग करने वाले प्रत्येक नागरिक का भी यह दायित्व है कि वह अपुष्ट जानकारी को आगे न बढ़ाए। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण उसके साथ जुड़ी उत्तरदायित्व की भावना भी है।
राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि अल्पकालिक चुनावी लाभ के लिए अपनाई गई आक्रामक भाषा दीर्घकाल में लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर कर सकती है। स्वस्थ लोकतंत्र वही है जिसमें मतभेद हों, किंतु संवाद की मर्यादा भी बनी रहे।
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उत्तर प्रदेश की राजनीति एक नए मोड़ पर | Akhilesh Yadav Politics
उत्तर प्रदेश की वर्तमान राजनीति केवल सत्ता परिवर्तन की संभावनाओं का विषय नहीं है, बल्कि यह बदलते सामाजिक विश्वास, राजनीतिक भाषा और लोकतांत्रिक अपेक्षाओं का भी दर्पण है। अखिलेश यादव हों, भारतीय जनता पार्टी हो, कांग्रेस हो अथवा कोई अन्य राजनीतिक दल, प्रत्येक के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनता का स्थायी विश्वास प्राप्त करना है। यह विश्वास केवल नारों, प्रतीकों अथवा चुनावी अभियानों से नहीं बनता, बल्कि निरंतर कार्य, स्पष्ट विचार और उत्तरदायी नेतृत्व से निर्मित होता है।
राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र का स्वाभाविक और आवश्यक अंग है। किंतु यह प्रतिस्पर्धा तभी सार्थक बनती है जब उसका आधार तथ्य, नीति और जनहित हो। यदि राजनीतिक विमर्श केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह जाए, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित होती है। दूसरी ओर यदि बहस विकास, सुशासन, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय हित जैसे विषयों पर केंद्रित हो, तो लोकतंत्र और अधिक सशक्त बनता है।
समापन टिप्पणी
आज का मतदाता पहले से अधिक सजग, अधिक सूचित और अधिक विवेकशील है। वह नेताओं के वर्तमान वक्तव्यों के साथ-साथ उनके राजनीतिक इतिहास का भी मूल्यांकन करता है। वह भावनाओं को भी समझता है और तथ्यों को भी परखता है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। अंततः किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होता है। वही यह निर्धारित करती है कि कौन-सा नेतृत्व उसके विश्वास, उसकी आकांक्षाओं और उसके भविष्य की कसौटी पर खरा उतरता है। यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता है और यही उसकी स्थायी शक्ति भी।





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