BJP Star Campaigner | सायोनी घोष: विपक्ष की नेता या BJP Star Campaigner की अनौपचारिक ब्रांड एंबेसडर?
भारतीय राजनीति में कुछ लोग पद से बड़े होते हैं, कुछ दल से बड़े होते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जो अपने विरोधियों के लिए उतना काम कर जाते हैं जितना उनके समर्थक भी नहीं कर पाते। पश्चिम बंगाल की राजनीति को देखते हुए कई बार ऐसा लगता है कि लोकतंत्र अब विचारधारा का नहीं, बल्कि “अनजाने योगदान” का उत्सव बन चुका है।
पूरा पश्चिम बंगाल चुनाव देखिए। मंच अलग था, झंडा अलग था, नारे अलग थे, लेकिन परिणामों की दिशा में योगदान देने वाले किरदारों की सूची बनाइए तो कुछ नाम बड़े सम्मान के साथ भारतीय जनता पार्टी के “अनौपचारिक स्टार प्रचारकों” की सूची में दिखाई देने लगते हैं।
इन नामों में सबसे चर्चित नाम सायोनी घोष का है।
अब कोई यह मत समझ लीजिए कि उन्होंने भाजपा की सदस्यता ले ली है। भारतीय राजनीति में सदस्यता लेना पुरानी बात हो गई है। आजकल असली खेल सदस्यता के बिना योगदान देने का है। यही आधुनिक लोकतंत्र का स्टार्टअप मॉडल है।
BJP Star Campaigner
मुझे तो पूरा चुनाव देखकर ऐसा लगता रहा कि सायोनी घोष उस दुर्लभ राजनीतिक प्रजाति से आती हैं जो विपक्ष में रहकर सत्ता पक्ष को लाभ पहुंचाने की विलक्षण क्षमता रखती है। यह एक ऐसी कला है जिसे किसी विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाया जाता। यह अनुभव, उत्साह और रणनीतिक भूलों के मिश्रण से पैदा होती है।
वैसे यह कोई नई घटना नहीं है।
देश में भाजपा के ऐसे अनेक “BJP Star Campaigner” मौजूद हैं जो तकनीकी रूप से भाजपा में नहीं हैं। वे दूसरे दलों में रहते हैं, दूसरे दलों के मंच पर भाषण देते हैं, दूसरे दलों के झंडे उठाते हैं, लेकिन जनता के मन में भाजपा के लिए सहानुभूति पैदा करने का महान कार्य करते रहते हैं।
यह राजनीति का वही संस्करण है जिसमें बल्लेबाज विपक्ष की टीम का होता है लेकिन रन विरोधी टीम के खाते में जुड़ते रहते हैं।
समस्या यह है कि मौजूदा विपक्ष भाजपा की साम-दाम-दंड-भेद नीति को समझने के बजाय अब भी भावनात्मक भाषणों की बैलगाड़ी पर बैठकर चुनावी एक्सप्रेस को पकड़ने की कोशिश कर रहा है।
उधर भाजपा जेट इंजन से उड़ रही है और इधर विपक्ष अब भी यह तय कर रहा है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में गुस्सा ज्यादा दिखाना है या नाराजगी।
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स्थिति इतनी विचित्र हो चुकी है कि विपक्ष का हर दूसरा रणनीतिकार चुनाव हारने के बाद भी जीत के कारण ढूंढ लेता है और जीतने वाली पार्टी अगले चुनाव की तैयारी शुरू कर देती है।
लोकतंत्र के लिए यह स्थिति निश्चित रूप से दुखद है।
एक मजबूत लोकतंत्र को मजबूत विपक्ष चाहिए। लेकिन जब विपक्ष अपनी ऊर्जा भाजपा को हराने से ज्यादा अपने समर्थकों को समझाने में खर्च करने लगे कि “इस बार हार भी दरअसल नैतिक जीत है”, तब जनता धीरे-धीरे मनोरंजन मोड में चली जाती है।
आज विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या भाजपा नहीं है।
सबसे बड़ी समस्या वह आत्मविश्वास है जो वास्तविकता से कोई संबंध नहीं रखता।
हार के बाद भी रणनीति सही थी।
जनता गलत थी।
ईवीएम संदिग्ध थी।
मीडिया बिक गया था।
मौसम खराब था।
लेकिन रणनीति शानदार थी।
यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई छात्र हर साल फेल होने के बाद कहे कि प्रश्नपत्र ही गलत था।
ऐसे माहौल में बुद्धिमान लोग धीरे-धीरे विपक्षी राजनीति से दूरी बनाने लगते हैं। कारण सरल है। जब किसी संगठन में समस्या पर चर्चा करने की जगह समस्या बताने वाले को ही समस्या घोषित कर दिया जाए, तो समझदार लोग वहां से निकलने में ही भलाई समझते हैं।
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इस प्रक्रिया में उन्हें दोहरा लाभ मिलता है।
पहला लाभ यह कि उनका रक्तचाप सामान्य रहता है।
दूसरा लाभ यह कि उन्हें रोज सोशल मीडिया पर यह सिद्ध नहीं करना पड़ता कि लगातार हारना भी एक प्रकार की रणनीतिक जीत है।
हालांकि सायोनी घोष को मैं इस श्रेणी में नहीं रखता।
उनकी राजनीतिक यात्रा अलग है।
वह उस दौर से भाजपा के लिए लाभकारी साबित होती दिखाई देती हैं जब वह संसद टीवी से सामने आई अपनी चर्चित रीलों और सार्वजनिक उपस्थिति के कारण राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रही थीं।
उनकी लोकप्रियता, उनकी मुखरता और उनकी राजनीतिक शैली ने जितना ध्यान उनके समर्थकों को आकर्षित किया, उससे कहीं अधिक ध्यान उनके विरोधियों को संगठित करने में भी भूमिका निभाई।
BJP Star Campaigner
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राजनीति का एक सिद्धांत है-
कभी-कभी आपका विरोधी आपकी सबसे बड़ी संपत्ति होता है।
और कभी-कभी आपका समर्थक आपकी सबसे बड़ी चुनौती।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में कई मौकों पर ऐसा लगा कि भाजपा को जितना लाभ अपने प्रचारकों से मिला, उससे कम नहीं उन लोगों से मिला जो पूरे उत्साह के साथ भाजपा का विरोध कर रहे थे।
यह विरोध इतना ऊर्जावान था कि उसने भाजपा समर्थकों में भी नया जोश भर दिया।
कहते हैं आग को बुझाने के लिए पानी चाहिए।
लेकिन भारतीय राजनीति में कई लोग आग बुझाने के लिए पेट्रोल लेकर पहुंच जाते हैं।
फिर आश्चर्य करते हैं कि लपटें और ऊंची क्यों हो गईं।
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इसी संदर्भ में राघव चड्ढा का नाम भी अक्सर राजनीतिक चर्चाओं में आता है।
विरोध की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो अपने समर्थकों को प्रेरित करने से ज्यादा विरोधियों को सक्रिय कर देते हैं।
उनका हर बयान, हर प्रतिक्रिया और हर राजनीतिक प्रयोग विरोधी खेमे के लिए मुफ्त का चुनावी विज्ञापन बन जाता है।
यह एक असाधारण प्रतिभा है।
मार्केटिंग की दुनिया में इसे “Reverse Branding” कहा जा सकता है।
राजनीति में इसे “विपक्षी आत्मनिर्भरता योजना” कहा जाना चाहिए।
भाजपा को शायद इस बात का सबसे बड़ा लाभ मिला है कि उसके विरोधियों ने कई बार उसे हराने की रणनीति के नाम पर वही सब किया जो उसे और मजबूत बनाता गया।
यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई व्यक्ति मच्छर मारने के लिए पूरा घर जला दे और फिर गर्व से कहे कि देखो, मच्छर तो नहीं बचा।
जब तक विपक्ष इस मूलभूत प्रश्न का उत्तर नहीं खोजता कि जनता उससे दूर क्यों जा रही है, तब तक भाजपा को हराने के लिए भाजपा से ज्यादा मेहनत विपक्ष के ही कुछ चेहरे करते रहेंगे।
और तब तक राजनीति का यह व्यंग्य चलता रहेगा।
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एक तरफ भाजपा अपने स्टार प्रचारकों की सूची जारी करेगी।
दूसरी तरफ जनता अपनी सूची बनाएगी, जिसमें ऐसे नेताओं के नाम होंगे जो दूसरे दलों में रहकर भी भाजपा को सबसे ज्यादा लाभ पहुंचाते हैं।
और संभव है कि उस सूची में कुछ नाम हर चुनाव के बाद स्थायी सदस्य बने रहें।
और अंत में,
लोकतंत्र की यही विडंबना है।
कभी-कभी चुनाव विचारधारा नहीं जीतती।
कभी-कभी चुनाव रणनीति जीतती है।
और कभी-कभी चुनाव विरोधियों की गलतियां जीत जाती हैं।
पश्चिम बंगाल का राजनीतिक रंगमंच भी शायद इसी तीसरी श्रेणी का सबसे बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है, जहां अभिनेता अलग-अलग दलों के हैं, लेकिन तालियां किसी और के हिस्से में चली जाती हैं।
यही भारतीय राजनीति का आधुनिक चमत्कार है।
जहां विरोध करना और प्रचार करना, दोनों कई बार एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाते हैं।






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