Cat Crossing Superstition | एक बिल्ली और पूरी भीड़ क्यों रुक गई?

Cat Crossing Superstition | बिल्ली के रास्ता काटने वाले अंधविश्वास पर तीखा व्यंग्य। जानिए कैसे Cat Crossing Superstition हमारी सोच, भीड़ मानसिकता और डर के कारोबार को उजागर करता है। हँसी के साथ आत्मचिंतन करने वाला व्यंग्य।


Cat Crossing Superstition | बिल्ली ने रास्ता नहीं, हमारी सोच काटी है!

व्यंग्यकार: सीतेश चौधरी

Cat Crossing Superstition

जब बिल्ली से ज़्यादा डर इंसान अपने दिमाग से खाने लगे… | Cat Crossing Superstition

भारत एक ऐसा देश है जहाँ हर समस्या का समाधान भगवान, सरकार, किस्मत या पड़ोसी के भरोसे छोड़ दिया जाता है। लेकिन जैसे ही एक बिल्ली सड़क पार करती है, पूरा राष्ट्र अचानक आत्मनिर्भर हो जाता है। हर आदमी खुद निर्णय लेता है कि अब एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाना है।

यह वही देश है जहाँ पुल गिर जाए तो लोग कहते हैं- “जांच होगी।”

ट्रेन चार घंटे लेट हो जाए तो कहते हैं- “भारत है, चलता है।”

बिजली बारह घंटे गायब रहे तो कहते हैं- “थोड़ी देर और रुक जाओ।”

लेकिन…

अगर एक दुबली-पतली बिल्ली सड़क पार कर जाए तो वही लोग ऐसे रुक जाते हैं जैसे संसद में अविश्वास प्रस्ताव आ गया हो।

सड़क वही रहती है।

धूप वही रहती है।

गड्ढे वही रहते हैं।

धूल वही रहती है।

बस अचानक इंसान की बुद्धि छुट्टी पर चली जाती है और डर स्थायी नौकरी पर आ जाता है।


बिल्ली नहीं, मानो ब्रह्मांड ने ट्रैफिक संभाल लिया हो | Cat Crossing Superstition

दृश्य बड़ा मनोरम होता है।

एक तरफ बाइक वालों की कतार।

दूसरी तरफ कार वाले।

पीछे रिक्शा।

उसके पीछे सब्ज़ी वाला।

फिर एक एम्बुलेंस हॉर्न बजाती हुई।

लेकिन किसी की हिम्मत नहीं कि आगे निकल जाए।

ऐसा लगता है जैसे सड़क पर बिल्ली नहीं, भारतीय रिज़र्व बैंक का गवर्नर बैठा हो और घोषणा कर दी हो-

“आज भाग्य का लेन-देन बंद रहेगा।”

सब एक-दूसरे को देख रहे हैं।

हर चेहरे पर वही भाव-

“पहला मूर्ख मैं क्यों बनूँ?”

यही भारतीय लोकतंत्र का सबसे सफल प्रयोग है।

जोखिम हमेशा दूसरा उठाए।

श्रेय हम बाद में ले लेंगे।

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बिल्ली बेचैन नहीं होती, इंसान हो जाता है | Cat Crossing Superstition

ज़रा उस बिल्ली के बारे में भी सोचिए।

उसे शायद सामने किसी घर से दूध की खुशबू आई होगी।

या किसी चूहे ने आपातकालीन बैठक बुला ली होगी।

या फिर उसे अपनी बिल्ली-समाज की किसी रिश्तेदार से मिलने जाना होगा।

वह आराम से सड़क पार करती है।

पीछे मुड़कर भी नहीं देखती।

उसे पता भी नहीं कि उसके एक कदम ने पाँच मिनट के लिए पूरे ट्रैफिक को आध्यात्मिक बना दिया है।

अगर कभी किसी बिल्ली को यह समझ आ जाए कि इंसान उससे इतना डरता है, तो वह भी शायद अगले चुनाव में टिकट माँग ले।


भारत का सबसे सफल स्टार्टअप – डर प्राइवेट लिमिटेड | Cat Crossing Superstition

इस देश में सबसे अधिक बिकने वाला उत्पाद अगर कोई है तो वह है- डर।

डर बेचने के लिए किसी फैक्ट्री की ज़रूरत नहीं।

बस एक कहानी चाहिए।

किसी दादी की याद चाहिए।

किसी पड़ोसी का अनुभव चाहिए।

और एक वाक्य-

“हमारे साथ भी एक बार ऐसा हुआ था…”

बस…

उसके बाद विज्ञान कमरे से बाहर चला जाता है।

तर्क खिड़की से कूद जाता है।

और अंधविश्वास सोफे पर पैर फैलाकर बैठ जाता है।


हेलमेट खुला है, लेकिन चिंता बिल्ली की है | Cat Crossing Superstition

सड़क पर खड़ा एक स्कूटर चालक हेलमेट पहने हुए है।

सरकार का नियम पूरा।

लेकिन हेलमेट का स्ट्रैप खुला हुआ है।

अगर दुर्घटना हुई तो हेलमेट सबसे पहले उड़कर किसी पेड़ पर जा बैठेगा।

लेकिन उसे इसकी चिंता नहीं है।

चिंता इस बात की है कि बिल्ली ने अभी-अभी उसका “भाग्य नेटवर्क” कमजोर कर दिया है।

मोबाइल जेब में है।

उस पर लिखा है- 5G Ready

लेकिन दिमाग अब भी 500 BC Version पर चल रहा है।

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झूठ बोलने में पाप नहीं, बिल्ली पार करे तो संकट | Cat Crossing Superstition

उधर एक युवक मोबाइल पर बात कर रहा है।

“हाँ भाई… बस पहुँच ही गया हूँ।”

जबकि वह अभी घर से निकला ही है।

झूठ बोलते समय उसकी आत्मा एकदम शांत है।

न अपराधबोध।

न पश्चाताप।

न डर।

लेकिन उसी समय बिल्ली सड़क पार करती है और उसकी वैज्ञानिक चेतना इस्तीफा देकर घर चली जाती है।

अचानक उसे याद आता है-

“आज तो निकलना ही नहीं चाहिए था।”

मनुष्य का चरित्र बड़ा दिलचस्प है।

जिस पाप का प्रमाण मौजूद है, उससे उसे डर नहीं लगता।

जिसका कोई प्रमाण नहीं, उससे उसकी नींद उड़ जाती है।


‘मैं नहीं मानता’ वाला भारतीय वैज्ञानिक | Cat Crossing Superstition

सबसे मनोरंजक पात्र वह सज्जन होते हैं जो हर चर्चा की शुरुआत इसी वाक्य से करते हैं-

“मैं इन सब बातों को बिल्कुल नहीं मानता।”

फिर बिल्ली सड़क पार करती है।

वे एक कदम आगे बढ़ाते हैं।

फिर अचानक रुक जाते हैं।

चारों तरफ देखते हैं।

कोई निकलता नहीं।

फिर मुस्कुराकर कहते हैं-

“वैसे… दो मिनट रुकने में क्या जाता है?”

यही वाक्य इस देश के अंधविश्वास का ऑक्सीजन सिलेंडर है।

“क्या जाता है?”

यहीं से हर भ्रम जन्म लेता है।

यहीं से हर डर अमर हो जाता है।

यहीं से हर अगली पीढ़ी सीखती है-

“बेटा… मान लेने में नुकसान क्या है?”

फिर वही बेटा बड़ा होकर अपने बेटे से यही कहता है।

और इस तरह डर हमारी सबसे सफल पारिवारिक विरासत बन जाता है।


भीड़ का सबसे बड़ा धर्म- ‘पहले कोई और’ | Cat Crossing Superstition

धूप तेज़ हो चुकी है।

हॉर्न लगातार बज रहे हैं।

लोगों के चेहरे पसीने से भीग रहे हैं।

लेकिन सड़क अब भी खाली है।

क्यों?

क्योंकि हर आदमी किसी “कोई और” का इंतज़ार कर रहा है।

कोई और पहले निकले।

कोई और जोखिम ले।

कोई और प्रयोग करे।

हम तो परिणाम देखकर निर्णय लेंगे।

यही वह मानसिकता है जिसने अंधविश्वास को धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन बना दिया।

बिल्ली तो केवल एक बार रास्ता काटती है।

लेकिन भीड़ आदमी के भीतर बैठकर उसका साहस रोज़ काटती रहती है।

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डर का कारोबार, श्रद्धा का ठेका और विवेक की छुट्टी | Cat Crossing Superstition

हर आदमी दूसरे को मूर्ख समझता है

सड़क किनारे एक बुज़ुर्ग अपनी खिड़की से यह पूरा दृश्य देख रहे हैं।

चेहरे पर हल्की मुस्कान है।

उन्हें सड़क पर खड़े लोग बड़े भोले लग रहे हैं।

मन ही मन सोच रहे हैं-

“कैसे-कैसे पढ़े-लिखे मूर्ख हो गए हैं आजकल!”

लेकिन तभी उनकी नज़र अपने दरवाज़े पर टंगे काले दैत्य-मुखौटे पर पड़ती है।

वह थोड़ा तिरछा हो गया है।

वे तुरंत उठकर उसे सीधा कर देते हैं ताकि बुरी नज़र घर के भीतर प्रवेश न कर जाए।

उधर सड़क वाले अगर इन्हें देख लें तो हँसेंगे।

इधर ये सड़क वालों पर हँस रहे हैं।

यानी इस देश में सबसे बड़ा लोकतंत्र मूर्खता का है।

हर आदमी को अपने आसपास उससे बड़ा मूर्ख मिल ही जाता है।

और यही उसका आत्मविश्वास बनाए रखता है।


अंधविश्वास का सुपरमार्केट | Cat Crossing Superstition

भारत में अगर कोई उद्योग सबसे अधिक रोजगार देता है तो वह है- डर उद्योग।

यहाँ हर डर का अपना उत्पाद है।

नज़र लगी?

लो, काला टीका लगा लो।

व्यापार नहीं चल रहा?

नींबू-मिर्ची टाँग दो।

बच्चा रो रहा है?

काजल लगा दो।

ग्रह नाराज़ हैं?

रत्न पहन लो।

घर में क्लेश है?

ताबीज़ बाँध लो।

सफलता नहीं मिल रही?

दिशा बदल लो।

और अगर कुछ भी समझ न आए…

तो कह दो-

“समय ही खराब चल रहा है।”

भारत शायद दुनिया का इकलौता देश है जहाँ असफलता का दोष आदमी से पहले ग्रहों पर जाता है।


नींबू-मिर्ची का कॉन्ट्रैक्ट जॉब | Cat Crossing Superstition

मुझे सबसे ज़्यादा सहानुभूति नींबू और मिर्ची से होती है।

बेचारे पूरी रात दुकान की सुरक्षा करते हैं।

सुबह झाड़ू के साथ नाली में बहा दिए जाते हैं।

न कोई विदाई समारोह।

न अनुभव प्रमाण पत्र।

न पेंशन।

न ग्रेच्युटी।

रात तक वे व्यापार के सुरक्षा सलाहकार होते हैं।

सुबह होते-होते कूड़े के कर्मचारी बन जाते हैं।

अगर नींबू बोल पाता तो शायद कहता-

“भाई साहब, जितनी नज़र रोक सकता था, रोक दी। अब मेरी भी एक्सपायरी डेट होती है।”

मिर्ची शिकायत करती-

“जब तक हरी थी तब तक रक्षा कवच थी। सूख गई तो कूड़ेदान में फेंक दिया।”

धर्म में भी अब कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम लागू हो चुका है।

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सिंदूर का स्थायी व्यवसाय | Cat Crossing Superstition

नींबू और मिर्ची की नौकरी अस्थायी है।

लेकिन सिंदूर बड़ा समझदार व्यापारी है।

उसे मालूम है-

जब तक इंसान डरता रहेगा…

उसका बाज़ार चलता रहेगा।

डर से बड़ा कोई निवेश नहीं।

और भरोसे से बड़ा कोई ग्राहक नहीं।


भक्ति बनाम प्लास्टिक | Cat Crossing Superstition

थोड़ी दूर एक गाय पॉलीथीन में लिपटी रोटियाँ खोज रही है।

हर घर से उसके नाम की पहली रोटी निकली होगी।

किसी ने श्रद्धा से।

किसी ने परंपरा से।

किसी ने इसलिए कि वह बासी थी।

लेकिन रोटी प्लास्टिक में लिपटी हुई है।

गाय रोटी के साथ पॉलीथीन भी खा रही है।

उसी समय एक सज्जन हाथ जोड़कर कहते हैं-

“गौ माता की जय!”

मनुष्य बड़ा अद्भुत प्राणी है।

जिसे माता कहता है…

उसे कूड़ा भी खिलाता है।

जिसकी पूजा करता है…

उसी को सड़क पर डंडा मारकर हटाता भी है।

और फिर सोशल मीडिया पर लिखता है-

“हमारी संस्कृति महान है।”

संस्कृति सचमुच महान है।

बस…

व्यवहार छुट्टी पर चला गया है।


“पहले कोई और”- इस देश का सबसे बड़ा देवता | Cat Crossing Superstition

सड़क पर अब भी भीड़ खड़ी है।

धूप सिर पर है।

पसीना बह रहा है।

लेकिन कदम आगे नहीं बढ़ रहे।

इतने में एक आदमी थोड़ा साहस करता है।

बस आधा कदम।

पूरा नहीं।

आधा।

इतने में पचास आँखें उसकी तरफ घूम जाती हैं।

जैसे उसने सड़क पार करने का नहीं, सरकार गिराने का फैसला कर लिया हो।

वह वहीं रुक जाता है।

और भीड़ मुस्कुरा देती है।

यही भीड़ की असली ताकत है।

बिल्ली केवल एक बार रास्ता काटती है।

भीड़ रोज़ आदमी का साहस काटती है।

अगर वह निकल जाता और शाम को मोबाइल गिर जाता…

लोग कहते-

“देखा… बिल्ली के बाद निकला था।”

अगर उसी दिन बॉस डाँट देता…

“हमने पहले ही मना किया था।”

अगर पत्नी नाराज़ हो जाती…

“अपशगुन कभी खाली नहीं जाता।”

अगर चप्पल टूट जाती…

“अब तो मानोगे?”

इस देश में घटनाएँ बाद में होती हैं।

उनकी कहानियाँ पहले लिख दी जाती हैं।

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‘कोई और’ का दर्शन | Cat Crossing Superstition

भारत का सबसे बड़ा दार्शनिक शब्द है-

“कोई और।”

कोई और भ्रष्टाचार रोके।

कोई और नियम माने।

कोई और टैक्स ईमानदारी से दे।

कोई और आवाज़ उठाए।

कोई और जोखिम ले।

हम?

हम तो विशेषज्ञ हैं।

सलाह देंगे।

विश्लेषण करेंगे।

यूट्यूब पर वीडियो बनाएँगे।

व्हाट्सऐप पर लंबा संदेश भेजेंगे।

लेकिन पहला कदम…

वह कोई और उठाए।

अगर सलाह से देश विकसित होता तो भारत अब तक मंगल ग्रह पर मेट्रो चला चुका होता।


मोची सबसे बड़ा दार्शनिक निकला | Cat Crossing Superstition

सड़क किनारे बैठा मोची चुपचाप जूते सिल रहा है।

उसे बिल्ली से कोई मतलब नहीं।

उसे मालूम है-

इस देश में सबसे बड़ी आध्यात्मिकता पैरों में रहती है।

जूता फटते ही आदमी का पूरा दर्शन बाहर आ जाता है।

लोग उससे दस रुपये कम कराने के लिए बीस मिनट बहस करेंगे।

लेकिन किसी ग्रह की शांति के नाम पर पाँच हजार रुपये बिना रसीद के दे आएँगे।

मोची ने नेताओं के जूते भी देखे हैं।

भक्तों के भी।

नास्तिकों के भी।

अमीरों के भी।

गरीबों के भी।

उसे मालूम है-

ऊपर चाहे जितनी विचारधाराएँ लड़ लें…

नीचे धूल सबके तलवों पर बराबर चिपकती है।

शायद इसी कारण उसे कभी टीवी डिबेट में नहीं बुलाया जाता।

आजकल सच बोलने वालों की मार्केट वैल्यू बहुत कम है।

गूलर का पेड़ और हमारी मानसिकता | Cat Crossing Superstition

पास में एक गूलर का पेड़ खड़ा है।

चुपचाप।

उसे कोई धागा नहीं बाँधता।

कोई उसकी परिक्रमा नहीं करता।

कोई फोटो नहीं खिंचवाता।

अगर वह पीपल होता…

तो श्रद्धा मिलती।

बरगद होता…

तो कथा लिखी जाती।

नीम होता…

तो औषधि घोषित हो जाता।

आम होता…

तो फलों का राजा कहलाता।

लेकिन वह गूलर है।

इसलिए बस छाया देता है।

धूल खाता है।

चिड़ियों को घर देता है।

और भुला दिया जाता है।

मनुष्य को हमेशा या तो डर चाहिए…

या लाभ।

जो डराता है…

वह पूजनीय बन जाता है।

जो फायदा देता है…

वह महान बन जाता है।

जो बिना शोर किए अपना काम करता रहता है…

उसे इतिहास फुटनोट में भी जगह नहीं देता।

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जिसने सड़क नहीं, हमारी मानसिकता पार की | Cat Crossing Superstition

फिर आया वह बच्चा…

इतने में भीड़ के पीछे से एक छोटा-सा बच्चा दौड़ता हुआ आता है।

पीठ पर भारी बस्ता।

एक तरफ टेढ़ी लटकती पानी की बोतल।

जूते का फीता खुला हुआ।

बाल ऐसे जैसे सुबह कंघी से उसकी वैचारिक असहमति हो गई हो।

वह न किसी की तरफ देखता है…

न बिल्ली की तरफ…

न भीड़ की तरफ…

न शकुन…

न अपशगुन…

उसे सिर्फ़ स्कूल पहुँचना है।

वह बिना रुके सड़क पार कर जाता है।

बस…

इतनी-सी घटना पूरे दृश्य का सबसे बड़ा दर्शन बन जाती है।

जिस रास्ते को बड़े लोग अपशगुन समझकर रोक रहे थे…

उसी रास्ते को बच्चे ने सामान्य रास्ता समझकर पार कर लिया।

क्यों?

क्योंकि उसके भीतर अभी डर का सॉफ़्टवेयर इंस्टॉल नहीं हुआ था।

उसके दिमाग में अभी समाज के फ़ॉरवर्डेड मैसेज डाउनलोड नहीं हुए थे।

उसे अभी यह नहीं सिखाया गया था कि निर्णय लेने से पहले चार लोगों की शक्ल देखनी चाहिए।

उसे अभी यह भी नहीं बताया गया था कि विवेक से बड़ा पड़ोसियों का अनुभव होता है।

वह इसलिए नहीं निकला कि वह बहादुर था।

वह इसलिए निकला क्योंकि वह अभी तक डर की शिक्षा से वंचित था।

और यही उसकी सबसे बड़ी शिक्षा थी।


डर की फैक्ट्री कैसे चलती है? | Cat Crossing Superstition

हर अंधविश्वास की शुरुआत एक कहानी से होती है।

कोई कहता है-

“मेरे चाचा बिल्ली के बाद निकले थे, उसी दिन उनका स्कूटर पंचर हो गया था।”

दूसरा तुरंत जोड़ता है-

“हमारे पड़ोसी के साथ भी ऐसा ही हुआ था।”

तीसरा कहता है-

“इतने लोग गलत थोड़े ही होंगे!”

बस…

यहीं से तर्क का पोस्टमार्टम शुरू हो जाता है।

कोई यह नहीं पूछता कि उस दिन लाखों लोग बिल्ली के बाद निकले होंगे, उनके साथ क्या हुआ?

क्योंकि इंसान को सत्य नहीं, कहानी याद रहती है।

तथ्य हमेशा मेहनत माँगते हैं।

किस्से मुफ्त मिल जाते हैं।


सोशल मीडिया वाला अंधविश्वास | Cat Crossing Superstition

पहले डर दादी सुनाती थीं।

अब एल्गोरिद्म सुनाता है।

पहले मोहल्ले का पंडित कहता था-

“आज यह मत करना।”

अब पाँच लाख व्यूज़ वाला रील निर्माता कहता है-

“अगर आपने यह वीडियो स्किप किया तो सात दिन तक दुर्भाग्य आपका पीछा करेगा।”

और मज़े की बात देखिए…

जो लोग खुद को “डिजिटल इंडिया” का नागरिक बताते हैं…

वे भी वीडियो पूरा देखते हैं।

कहीं दुर्भाग्य सच में न आ जाए!

यानी तकनीक बदल गई।

डर का ऑपरेटिंग सिस्टम वही रहा।

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विज्ञान हमारे पास है, विवेक नहीं | Cat Crossing Superstition

हम चंद्रमा पर पहुँच गए।

मंगल की तस्वीरें खींच रहे हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बना रहे हैं।

लेकिन अगर किसी शादी में दूल्हे के सामने बिल्ली निकल जाए…

तो पूरा परिवार ऐसे रुक जाता है जैसे नासा ने लॉन्च टाल दिया हो।

मोबाइल की स्क्रीन पर हम क्वांटम कंप्यूटिंग का वीडियो देखते हैं…

और उसी मोबाइल में किसी बाबा का संदेश भी सेव रखते हैं-

“आज शाम छह बजे के बाद उत्तर दिशा में मत जाना।”

हमने तकनीक को आधुनिक बना लिया…

लेकिन सोच का सॉफ़्टवेयर अपडेट करना भूल गए।


अंधविश्वास का असली बिजनेस मॉडल | Cat Crossing Superstition

ध्यान से देखिए।

डर हमेशा वही बेचता है…

जिसे आपके निर्णय पर नियंत्रण चाहिए।

अगर आप सोचने लगेंगे…

तो बाज़ार बंद हो जाएगा।

अगर आप सवाल पूछेंगे…

तो दुकान खाली हो जाएगी।

अगर आप प्रमाण माँगेंगे…

तो चमत्कार बेरोज़गार हो जाएगा।

इसलिए आपको हमेशा यही सिखाया जाता है-

“मत सोचो… बस मान लो।”

क्योंकि सोचने वाला ग्राहक कभी स्थायी ग्राहक नहीं बनता।


बिल्ली का बयान | Cat Crossing Superstition

अगर कभी इस पूरे मामले पर बिल्ली की प्रेस कॉन्फ्रेंस हो जाए…

तो शायद वह कहे-

“भाइयों और बहनों…

मैं तो पिछले पाँच हज़ार वर्षों से सिर्फ़ सड़क पार कर रही हूँ।

आप लोगों ने बीच में अपना डर जोड़ लिया।

मैंने कभी नहीं कहा कि मेरे बाद मत निकलना।

मैं तो खुद कई बार कुत्ते से बचने के लिए भाग रही होती हूँ।

आपने मुझे राष्ट्रीय अपशगुन बना दिया।”

सोचिए…

जिस जीव को अपने अगले भोजन की चिंता है…

उसे हमने अपने भविष्य का नियंत्रक घोषित कर दिया।

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असली रास्ता किसने काटा? | Cat Crossing Superstition

सच यह है…

उस दिन बिल्ली ने रास्ता नहीं काटा था।

रास्ता तो पहले भी खुला था।

बंद हमारे भीतर था।

बिल्ली अपने स्वभाव के अनुसार चली गई।

इंसान अपने डर के अनुसार रुक गया।

हमारी सबसे बड़ी समस्या अंधविश्वास नहीं है।

हमारी सबसे बड़ी समस्या वह सुविधा है…

जिसमें हम सोचने की जगह मान लेना पसंद करते हैं।

हम प्रश्न पूछने से डरते हैं।

लेकिन डरने से नहीं डरते।

हम विज्ञान की बातें करते हैं।

लेकिन निर्णय संकेतों से लेते हैं।

हम आधुनिक होने का दावा करते हैं।

लेकिन विवेक से पहले भीड़ का चेहरा पढ़ते हैं।


और अंत में,

इस देश में सड़कें कम हैं…

मानसिक चौराहे ज़्यादा हैं।

हर मोड़ पर कोई न कोई बिल्ली नहीं…

कोई न कोई डर बैठा है।

कोई ग्रह का।

कोई जाति का।

कोई धर्म का।

कोई समाज का।

कोई “लोग क्या कहेंगे” का।

और हर डर के सामने भीड़ खड़ी है…

किसी “कोई और” का इंतज़ार करती हुई।

कोई और पहला कदम उठाए।

कोई और सच बोले।

कोई और सवाल पूछे।

कोई और जोखिम ले।

जबकि इतिहास हमेशा उन्हीं लोगों ने लिखा है…

जिन्होंने भीड़ की तरफ़ नहीं…

अपने विवेक की तरफ़ देखा।

उस दिन सड़क बच्चे ने नहीं खोली थी।

सड़क तो पहले से खुली थी।

उसने केवल यह साबित किया था कि-

बिल्ली ने सड़क काटी थी, लेकिन डर इंसान ने खुद पैदा किया था।

और शायद…

यही Cat Crossing Superstition का सबसे बड़ा सच है।

बिल्ली आज भी सड़क पार कर रही है।

फर्क सिर्फ़ इतना है-

वह आगे बढ़ रही है…

और हम अब भी वहीं खड़े हैं।


जब तक हम तथ्यों से अधिक संकेतों पर, विज्ञान से अधिक अफ़वाहों पर और विवेक से अधिक भीड़ पर भरोसा करते रहेंगे, तब तक हर बिल्ली हमें अपशगुन लगेगी। जिस दिन हम अपने डर से प्रश्न पूछना सीख जाएँगे, उसी दिन पता चलेगा कि रास्ता कभी बंद था ही नहीं- बंद तो केवल हमारी सोच थी।

लिखते रहेंगे………सीतेश चौधरी

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देश बदल रहा है, व्यवस्था सुधर रही है, नेता सच बोल रहे हैं और सोशल मीडिया पर लोग शालीन हो चुके हैं। अगर आपको भी ऐसा लगता है, तो शायद आपको मेरे व्यंग्य पढ़ने की ज़रूरत है। मैं उन बातों पर लिखता हूँ जिन्हें देखकर आम आदमी सिर पकड़ लेता है और व्यवस्था प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला लेती है। मेरा उद्देश्य किसी को खुश या नाराज़ करना नहीं, बल्कि सच को हँसी के लिबास में पेश करना है। यह पेज उन लोगों के लिए है जो खबरों के बीच छिपे व्यंग्य को समझते हैं और हँसते-हँसते गंभीर बातें सोचने का साहस रखते हैं।"जहाँ तर्क थक जाता है, वहाँ व्यंग्य अपनी बात कहता है।"

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