English Article | नेता का English Article या पीआर का कमाल?

English Article | English Article पर आधारित तीखा राजनीतिक व्यंग्य। नेताओं के नाम से प्रकाशित लेख, पीआर, छवि निर्माण और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर कटाक्ष।


English Article का महाभारत: नेता लिखते हैं, लिखवाते हैं या जनता ही पढ़कर परीक्षा देती है?

जब अख़बार में लेख छपता है, तब सवाल सिर्फ़ भाषा का नहीं, भरोसे का भी होता है | English Article

भारतीय राजनीति में दो चीज़ें कभी पुरानी नहीं पड़तीं—एक चुनावी वादे और दूसरी नेताओं के नाम से छपने वाले अंग्रेज़ी के लंबे-लंबे लेख। जैसे ही किसी प्रतिष्ठित अख़बार में किसी नेता का English Article प्रकाशित होता है, जनता का एक वर्ग तालियाँ बजाता है, दूसरा वर्ग चश्मा साफ़ करता है और तीसरा वर्ग यह सोचने लगता है कि आखिर यह लेख नेता ने लिखा, लिखवाया या फिर लोकतंत्र ने सामूहिक रूप से तैयार किया।

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राजनीति में अब भाषण से ज़्यादा महत्व लेख का हो गया है। पहले नेता मंच पर बोलकर लोकप्रिय होते थे, अब अख़बार के ओप-एड पन्नों पर छपकर विद्वान घोषित होने लगे हैं। ऐसा लगता है कि लोकतंत्र में जनादेश से पहले शब्दकोश का प्रमाणपत्र आवश्यक हो गया है।

दिलचस्प बात यह है कि जनता को इस बात से विशेष आपत्ति नहीं होती कि कोई नेता अंग्रेज़ी में लिखता है या नहीं लिखता। असली उत्सुकता तब पैदा होती है जब लेख इतना परिष्कृत, इतना अकादमिक और इतना चमकदार दिखाई देता है कि पाठक को लगता है—”यह लेख पढ़ रहा हूँ या किसी विश्वविद्यालय का शोधपत्र?”

यहीं से व्यंग्य जन्म लेता है।

राजनीति में आजकल एक नया फैशन है—व्यक्तित्व निर्माण। कपड़े विशेषज्ञ तय करते हैं, भाषण सलाहकार लिखते हैं, सोशल मीडिया टीम पोस्ट करती है और कभी-कभी लेख भी विशेषज्ञों की टीम तैयार करती है। इसमें कोई बुराई नहीं, क्योंकि दुनिया भर के बड़े नेता भाषण लेखकों और शोधकर्ताओं की मदद लेते हैं। समस्या तब शुरू होती है जब लेख को व्यक्तिगत विद्वता का अंतिम प्रमाणपत्र बना दिया जाता है।

अगर कोई नेता सचमुच स्वयं लिखता है तो यह प्रशंसनीय है। यदि टीम की सहायता से लिखता है, तब भी यह असामान्य नहीं। लेकिन यदि जनता के सामने ऐसा वातावरण बनाया जाए कि मानो शब्दकोश भी उसी नेता से शब्दों का अर्थ पूछकर छपता हो, तब व्यंग्यकार की कलम अपने आप मुस्कुराने लगती है।

हमारे यहाँ राजनीति में भाषा भी जाति, धर्म और क्षेत्र की तरह चुनावी मुद्दा बन जाती है। कोई हिंदी बोल दे तो उसे पिछड़ा समझ लिया जाता है, कोई अंग्रेज़ी बोल दे तो उसे वैश्विक नेता घोषित कर दिया जाता है। मानो संविधान की प्रस्तावना अब ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी की भूमिका से जुड़ गई हो।

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यह भी कम रोचक नहीं कि कई बार जनता को नेता के विचारों से अधिक उसकी उच्चारण क्षमता में रुचि होने लगती है। लोग पूछते हैं—यदि लेख स्वयं लिखा है तो क्या नेता उसे सार्वजनिक मंच पर उसी सहजता से पढ़ सकता है? क्या वह उसमें प्रयुक्त जटिल शब्दों का आशय समझा सकता है? क्या वह आलोचनात्मक प्रश्नों का उत्तर दे सकता है?

ये प्रश्न किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं। ये हर उस सार्वजनिक प्रतिनिधि से पूछे जा सकते हैं जिसके नाम से कोई गंभीर लेख प्रकाशित होता है।

लोकतंत्र में पारदर्शिता का अर्थ केवल संपत्ति का ब्यौरा देना नहीं, बल्कि बौद्धिक ईमानदारी भी है। यदि किसी लेख के पीछे शोधकर्ताओं, सलाहकारों और संपादकों की टीम है, तो इसे स्वीकार करने में संकोच कैसा? दुनिया के अनेक शीर्ष नेता ऐसा करते हैं और इससे उनकी प्रतिष्ठा कम नहीं होती।

विडंबना यह है कि हमारे यहाँ कभी-कभी लेख से ज़्यादा चर्चा इस बात की होती है कि उसमें प्रयुक्त कठिन अंग्रेज़ी शब्दों का उच्चारण कौन करेगा। ऐसा लगता है कि लेख नहीं, मौखिक परीक्षा होने वाली है। जनता परीक्षक है और नेता परीक्षार्थी।

लेकिन क्या नेतृत्व का मूल्यांकन केवल अंग्रेज़ी से होना चाहिए?

निश्चित रूप से नहीं।

नेतृत्व का मूल्यांकन उसके निर्णयों, प्रशासनिक क्षमता, नीतियों और जनता के प्रति जवाबदेही से होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति उत्कृष्ट अंग्रेज़ी बोलता है लेकिन शासन कमजोर है, तो भाषा उपलब्धि नहीं बचा सकती। उसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति साधारण भाषा बोलता है लेकिन शासन प्रभावी है, तो शब्दकोश उसकी लोकप्रियता तय नहीं करेगा।

फिर भी सार्वजनिक जीवन में एक बात आवश्यक है—प्रामाणिकता।

यदि कोई लेख स्वयं लिखा गया है तो उसे पढ़ने, समझाने और उस पर बहस करने में संकोच क्यों? और यदि टीम ने तैयार किया है तो यह बताने में हिचक क्यों? आखिर राजनीति कोई साहित्य अकादमी की परीक्षा तो है नहीं।

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आजकल पीआर की दुनिया में छवि का निर्माण इतना वैज्ञानिक हो गया है कि कभी-कभी असली नेता और प्रचारित नेता दो अलग-अलग व्यक्ति प्रतीत होते हैं। सोशल मीडिया पर एक व्यक्तित्व, अख़बार में दूसरा और चुनावी मंच पर तीसरा। जनता अब इन तीनों संस्करणों की तुलना करने लगी है।

व्यंग्य की असली ताकत यही है कि वह किसी की भाषा का नहीं, दिखावे का मज़ाक उड़ाता है।

और अंत में,

लोकतंत्र में जनता को अधिकार है कि वह सवाल पूछे। लेकिन सवाल भाषा की श्रेष्ठता का नहीं, पारदर्शिता का होना चाहिए। यदि कोई नेता किसी विचार का समर्थन करता है, तो उस विचार पर खुली बहस होनी चाहिए। यदि कोई लेख उसके नाम से प्रकाशित होता है, तो वह उसके तर्कों पर चर्चा करने के लिए भी तैयार रहे।

आखिर लोकतंत्र में सबसे कठिन शब्द “Democracy” नहीं, बल्कि “Accountability” है।

शब्दकोश याद कर लेने से जवाबदेही नहीं आती, और जवाबदेही निभाने वाले को शब्दकोश की आवश्यकता भी कम पड़ती है।

इसलिए अगली बार जब किसी प्रतिष्ठित अख़बार में किसी नेता का English Article प्रकाशित हो, तो केवल कठिन शब्दों की गिनती मत कीजिए। यह भी देखिए कि लेख में जो विचार लिखे गए हैं, क्या वही विचार मंच पर, प्रेस कॉन्फ़्रेंस में और जनता के बीच भी उतनी ही स्पष्टता से दिखाई देते हैं?

क्योंकि लोकतंत्र में असली परीक्षा उच्चारण की नहीं, उत्तरदायित्व की होती है। और जनता वह परीक्षक है जो उत्तर-पुस्तिका भी पढ़ती है और परिणाम भी घोषित करती है।

लिखते रहेंगे….. सीतेश चौधरी

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देश बदल रहा है, व्यवस्था सुधर रही है, नेता सच बोल रहे हैं और सोशल मीडिया पर लोग शालीन हो चुके हैं। अगर आपको भी ऐसा लगता है, तो शायद आपको मेरे व्यंग्य पढ़ने की ज़रूरत है। मैं उन बातों पर लिखता हूँ जिन्हें देखकर आम आदमी सिर पकड़ लेता है और व्यवस्था प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला लेती है। मेरा उद्देश्य किसी को खुश या नाराज़ करना नहीं, बल्कि सच को हँसी के लिबास में पेश करना है। यह पेज उन लोगों के लिए है जो खबरों के बीच छिपे व्यंग्य को समझते हैं और हँसते-हँसते गंभीर बातें सोचने का साहस रखते हैं।"जहाँ तर्क थक जाता है, वहाँ व्यंग्य अपनी बात कहता है।"

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