Expressway Republic | जहाँ गड्ढे भी राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा हैं!
व्यंग्यकार: सीतेश चौधरी
भारत बदल रहा है। इतना बदल रहा है कि अब इतिहास की किताबें भी शर्माकर अपना एडिशन अपडेट करने लगी हैं। कभी हमारे पूर्वज पेड़ों के नीचे बैठकर सभ्यता की शुरुआत करते थे, फिर हम गुफाओं में पहुँचे, फिर कच्ची सड़कें आईं, फिर पक्की सड़कें, और अब हम ऐसे युग में पहुँच चुके हैं जहाँ सड़क से ज़्यादा चर्चा सड़क के उद्घाटन, टोल और गड्ढों की होती है।
मुझे तो आज भी अपना बचपन याद है। तब हमारे पास खिलौने नहीं थे। हाथगाड़ी थी, उसके पहिए चौकोर थे। उसे धक्का देने से ज़्यादा हम उसे उठाकर चलाते थे। क्योंकि गोल पहिया तब तक शायद किसी सरकारी फाइल में मंजूरी का इंतजार कर रहा था।
दिल्ली भी तब कोई महानगर नहीं थी। एक बड़ा-सा गाँव था। पगडंडियाँ थीं, झाड़ियाँ थीं और झाड़ियों के पीछे बैठे लोग प्रकृति के साथ गहरा संवाद स्थापित करते थे। विकास की परिभाषा तब यह थी कि बारिश में अगर पैर केवल घुटने तक धँसे तो समझिए सड़क अच्छी बनी है।
Expressway Republic
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फिर समय बदला।
देश में सड़कों का ऐसा दौर आया कि नक्शे पर जहाँ सीधी रेखा खींचो, वहाँ एक्सप्रेसवे निकलने लगा। सुरंगें बनीं, फ्लाईओवर बने, पुल बने, बाईपास बने, रिंग रोड बनीं और टोल प्लाज़ा तो ऐसे उगे जैसे मानसून में कुकुरमुत्ते।
अब आप लद्दाख जाइए, स्पीति जाइए, सिसु जाइए, पहाड़ों के भीतर से गुजरती सुरंगें देखकर लगता है कि इंसान ने प्रकृति से कह दिया हो—”भाई, थोड़ा साइड हो, हमें जल्दी पहुँचना है।”
यह सच है कि देश में सड़क अवसंरचना का विस्तार अभूतपूर्व रहा है। दूर-दराज़ के इलाकों तक पहुँच आसान हुई है, यात्रा का समय घटा है और आर्थिक गतिविधियों को गति मिली है। लेकिन भारतीय नागरिक होने का सौभाग्य यही है कि हम उपलब्धियों के बीच भी हास्य खोज लेते हैं।
जैसे किसी एक्सप्रेसवे पर दो-चार गड्ढे दिख जाएँ तो तुरंत सोशल मीडिया पर आपातकाल लग जाता है।
अरे भाई!
दो सौ किलोमीटर की सड़क में दो गड्ढे हैं तो क्या हुआ?
इसे विकास का “सस्पेंशन टेस्ट” समझिए।
कार कंपनी लाख दावा करे कि उनकी गाड़ी मजबूत है, असली टेस्ट तो भारतीय सड़क ही लेती है।
कौन जाने कल इन्हीं गड्ढों से तेल निकल आए। तब यही लोग कहेंगे—”दूरदर्शी योजना थी।”
अब आते हैं टोल पर।
भारतीय लोकतंत्र में सबसे अनुशासित नागरिक वही होता है जो टोल प्लाज़ा पर लाइन में लगा हो।
वहाँ कोई जाति नहीं पूछता।
कोई धर्म नहीं पूछता।
बस FASTag का बैलेंस पूछता है।
राष्ट्रीय एकता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा?
फिर कुछ लोग कहते हैं कि पुलों पर दोपहिया क्यों नहीं चलते?
अरे भाई, हर सुविधा सबके लिए थोड़ी होती है।
कभी-कभी पुल भी सोचता होगा कि “आज थोड़ा लग्ज़री महसूस करूँ।”
वैसे भारत की सड़कें अब केवल सड़कें नहीं रहीं।
वे पर्यटन अभियान भी हैं।
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पहले लोग छुट्टियों में सोचते थे कि कहाँ जाएँ।
अब सोचते हैं—कौन-सा एक्सप्रेसवे ट्राई करें?
सड़क खुद डेस्टिनेशन बन चुकी है।
इधर एक और बहस चलती रहती है—एथेनॉल।
कुछ लोग कहते हैं कि पेट्रोल में एथेनॉल मिला तो गाड़ी ने मुँह फुला लिया।
दूसरे कहते हैं कि इससे विदेशी तेल पर निर्भरता घटेगी, किसानों को नया बाज़ार मिलेगा और पर्यावरण को लाभ होगा।
सच यह है कि तकनीकी विषयों पर निर्णय इंजीनियर और वैज्ञानिक लेते हैं, जबकि बहस हम व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर करते हैं।
अगर गाड़ी स्टार्ट न हो तो पहले बैटरी देखिए, सर्विस देखिए, मौसम देखिए, ईंधन की गुणवत्ता देखिए—हर समस्या का कारण केवल एक ही चीज़ मान लेना उतना ही आसान है जितना हर सफलता का श्रेय किसी एक व्यक्ति को दे देना।
हम भारतीयों की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि हम हर मुद्दे को तुरंत आस्था में बदल देते हैं।
अगर सड़क अच्छी निकली तो “महापुरुष।”
अगर कहीं पानी भर गया तो “षड्यंत्र।”
बीच का रास्ता हमें कभी पसंद ही नहीं आया।
आज सोशल मीडिया पर दो ही प्रकार के नागरिक मिलते हैं।
पहला कहेगा—”देश में कुछ हुआ ही नहीं।”
दूसरा कहेगा—”देश में जो भी अच्छा हुआ, वह एक ही दिन में हुआ।”
दोनों के बीच खड़ा आम आदमी बस यह सोच रहा होता है कि भाई, मेरी गाड़ी सर्विस सेंटर कब पहुँचेगी?
मैं तो सुझाव देता हूँ कि अगर हम हर फ्लाईओवर के नीचे से निकलने वाले वाहन चालक के लिए हेलमेट अनिवार्य कर दें तो बहस भी खत्म और सुरक्षा भी बढ़े।
क्योंकि भारतीय इंजीनियरिंग पर भरोसा है, लेकिन भारतीय किस्मत पर उससे भी ज़्यादा भरोसा है।
हमारी सबसे बड़ी ताकत यह है कि हम हर असुविधा में भी हास्य खोज लेते हैं।
ट्रैफिक में फँसेंगे तो मीम बनाएँगे।
टोल देंगे तो रील बनाएँगे।
गड्ढे में गिरेंगे तो स्लो मोशन वीडियो बनाएँगे।
और फिर लिखेंगे—
“Feeling Blessed.”
यही भारतीय आत्मा है।
Expressway Republic
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और अंत में,
विकास पर बहस होनी चाहिए।
सड़कों की गुणवत्ता पर सवाल भी होने चाहिए।
जहाँ कमियाँ हों, वहाँ सुधार भी होना चाहिए।
और जहाँ अच्छे काम हुए हों, उनकी सराहना भी होनी चाहिए।
लोकतंत्र का असली एक्सप्रेसवे यही है कि प्रशंसा और आलोचना—दोनों साथ चलें।
वरना केवल जय-जयकार या केवल हाय-हाय, दोनों ही अंततः ट्रैफिक जाम पैदा करते हैं।
इसलिए अगली बार जब आप किसी शानदार एक्सप्रेसवे पर 120 की रफ्तार से चलें तो विकास की सराहना कीजिए।
और अगर कहीं छोटा-सा गड्ढा मिल जाए तो गाड़ी धीरे कर लीजिए।
क्योंकि भारत में सड़कें सिर्फ मंज़िल तक नहीं पहुँचातीं—
वे धैर्य, हास्य और लोकतंत्र—तीनों की एक साथ परीक्षा भी लेती हैं।
आख़िर हम Expressway Republic के नागरिक जो ठहरे।




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