Instagram Reels | दुखी हो? रील देखो! सोशल मीडिया का नया नशा

Instagram Reels | इंस्टाग्राम रील्स के दौर में तनाव, सुंदरता, तुलना और डिजिटल लत पर तीखा व्यंग्य। मनोरंजन के पीछे छिपी आधुनिक जिंदगी की विडंबनाओं को कटाक्षपूर्ण अंदाज में देखिए।


Instagram Reels | जहाँ अवसाद भी रील देखकर मुस्कुराने लगता है!

कहते हैं कि मनुष्य ने विज्ञान के क्षेत्र में बहुत तरक्की कर ली है। चाँद पर पहुँच गया, मंगल पर पहुँचने की तैयारी कर रहा है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बना डाली और अब मशीनें भी इंसानों को समझने का दावा कर रही हैं। लेकिन इन सारी उपलब्धियों के बावजूद इंसान की सबसे बड़ी समस्या वही है—तनाव, चिंता, अकेलापन और अवसाद।

लेकिन घबराइए मत।

मानव सभ्यता ने इसका भी इलाज खोज लिया है।

इलाज का नाम है—Instagram Reels

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जी हाँ, जिस व्यक्ति को कल तक लगता था कि जीवन में कोई अर्थ नहीं बचा, उसे बस मोबाइल दीजिए और इंस्टाग्राम खोल दीजिए। पांच मिनट बाद वही व्यक्ति ऐसे मुस्कुरा रहा होगा जैसे उसे जीवन का परम सत्य प्राप्त हो गया हो।

यह अलग बात है कि दस मिनट बाद उसे याद आएगा कि बिजली का बिल नहीं भरा, EMI बाकी है, बॉस ने काम माँगा है, पत्नी नाराज़ है और बैंक खाते में पैसे नहीं हैं। लेकिन चिंता किस बात की?

अगली रील तैयार है!

इंस्टाग्राम ने मनुष्य को एक ऐसी अद्भुत सुविधा दी है जिसमें वास्तविक जीवन की समस्याओं को कुछ सेकंड के लिए स्क्रीन के नीचे स्वाइप किया जा सकता है।

महँगाई आई?

Swipe!

बेरोजगारी दिखी?

Swipe!

राजनीतिक विवाद?

Swipe!

बैंक बैलेंस?

उसे देखने की कोई आवश्यकता ही नहीं।

क्योंकि अगली रील में कोई समुद्र किनारे मुस्कुरा रहा है।

और यही आधुनिक अध्यात्म है।

पहले लोग दुखी होते थे तो मंदिर जाते थे, साधु-संतों के प्रवचन सुनते थे, गीता पढ़ते थे या किसी मित्र के घर बैठकर दुख साझा करते थे। आज का मनुष्य थोड़ा ज्यादा आधुनिक है। वह दुखी होता है तो इंस्टाग्राम खोलता है।

और फिर उसे पता चलता है कि दुनिया में उससे ज्यादा दुखी तो कोई है ही नहीं।

किसी को देखकर लगता है कि उसके जीवन में केवल प्रेम है।

किसी को देखकर लगता है कि उसके पास केवल पैसा है।

किसी को देखकर लगता है कि उसके पास केवल सुंदरता है।

और किसी को देखकर लगता है कि उसके पास ये तीनों चीजें एक साथ हैं।

बस यही देखकर हमारा अवसाद थोड़ा असमंजस में पड़ जाता है।

वह सोचता है—“भाई, मैं यहाँ रहूँ या इन लोगों के साथ चला जाऊँ?”

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इंस्टाग्राम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वहाँ हर व्यक्ति अपने जीवन का फिल्म निर्माता है। वास्तविक जीवन में आदमी सुबह उठकर बाल्टी लेकर पानी भरता है, ऑफिस जाता है, ट्रैफिक में फँसता है, बॉस की डाँट खाता है और शाम को सब्जी के दाम देखकर राष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर गंभीर चिंतन करता है।

लेकिन इंस्टाग्राम पर वही व्यक्ति किसी पहाड़ की चोटी पर खड़ा है।

पीछे सूर्यास्त है।

हवा बालों से खेल रही है।

और कैप्शन है—

“Living my best life.”

अब यह मत पूछिए कि वह पहाड़ तक पहुँचा कैसे।

यह सवाल Instagram Reels की आत्मा के विरुद्ध है।

वहाँ वास्तविकता की कोई आवश्यकता नहीं।

वहाँ केवल एंगल चाहिए।

आजकल तो लोग अपने चेहरे से लेकर अपने दुख तक का फिल्टर लगा लेते हैं। असली चेहरा देखकर खुद आदमी डर जाए, लेकिन फिल्टर लगते ही ऐसा लगता है कि अभी कोई फिल्म निर्माता उसे मुख्य भूमिका देने वाला है।

और फिर आती हैं वे रील्स जिन्हें देखकर आधुनिक युवक को लगता है कि संसार में अभी भी उम्मीद बाकी है।

किसी खूबसूरत युवती की नृत्य करती हुई रील सामने आ जाए तो बेचारा युवक अपनी सारी आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक समस्याएँ भूल जाता है।

कल तक वह बेरोजगारी पर चिंतित था।

आज उसे लगता है कि जीवन में अभी भी संभावनाएँ हैं।

कल तक वह महँगाई से परेशान था।

आज उसे लगता है कि महँगाई जैसी छोटी समस्या के सामने सुंदरता का यह विराट दर्शन अधिक महत्वपूर्ण है।

यहाँ तक कि कुछ लोग तो रील देखकर आध्यात्मिक आनंद की उस अवस्था में पहुँच जाते हैं जहाँ उन्हें न संसार याद रहता है, न नौकरी, न भविष्य।

बस स्क्रीन पर उंगली चलती रहती है।

Swipe।

Swipe।

Swipe।

और मनुष्य धीरे-धीरे उस महान अवस्था में पहुँच जाता है जिसे हमारे ऋषि-मुनियों ने वर्षों की तपस्या के बाद पाने की कोशिश की होगी।

अंतर केवल इतना है कि ऋषियों के पास स्मार्टफोन नहीं था।

अगर होता तो शायद वे भी हिमालय की गुफा में बैठकर ध्यान करने के बजाय रील देखते हुए कहते—

“वाह प्रभु! अगली रील दिखाओ।”

आज के युवक का ध्यान इतना मजबूत है कि घर में माँ दस बार आवाज लगा सकती है, पत्नी तीन बार बुला सकती है, बॉस पाँच मिस्ड कॉल कर सकता है—लेकिन रील के बीच में कोई आवाज नहीं पहुँचती।

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यह आधुनिक ध्यान की चरम अवस्था है।

इंसान इतना एकाग्र हो गया है कि उसे आसपास की दुनिया दिखाई ही नहीं देती।

मगर समस्या यह है कि इंस्टाग्राम हमें दुनिया से बचाता-बचाता धीरे-धीरे वास्तविक दुनिया से दूर भी कर देता है।

हम दूसरों की जिंदगी देखने में इतने व्यस्त हो गए हैं कि अपनी जिंदगी जीना भूलने लगे हैं।

किसी की छुट्टी देखकर हमें अपनी नौकरी खराब लगती है।

किसी का महँगा घर देखकर अपना घर छोटा लगने लगता है।

किसी का शानदार शरीर देखकर अपना शरीर बेकार लगने लगता है।

किसी का प्रेम देखकर अपना अकेलापन चुभने लगता है।

और फिर हम उसी प्लेटफॉर्म पर जाकर मानसिक शांति खोजते हैं जिसने हमारी तुलना करने की आदत को जन्म दिया है।

यह कुछ वैसा ही है जैसे कोई आदमी चाय गिरने से कपड़े गंदे कर ले और फिर उसी चाय से उन्हें साफ करने की कोशिश करे।

इंस्टाग्राम की अर्थव्यवस्था भी बड़ी रोचक है।

आपको मुफ्त में मनोरंजन मिलता है।

आपको मुफ्त में सुंदर चेहरे मिलते हैं।

आपको मुफ्त में प्रेरणादायक भाषण मिलते हैं।

आपको मुफ्त में रिश्तों की सलाह मिलती है।

आपको मुफ्त में करोड़पति बनने के तरीके मिलते हैं।

आपको मुफ्त में फिटनेस ज्ञान मिलता है।

और अंत में आप अपना सबसे कीमती सामान खर्च करते हैं—

समय।

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जिस समय में आदमी किताब पढ़ सकता था, परिवार से बात कर सकता था, टहल सकता था, कुछ नया सीख सकता था या अपने भविष्य पर काम कर सकता था, उसी समय वह तीस सेकंड की रील में अगले तीस मिनट खोज देता है।

यहाँ तक कि अब तो हमें अपनी पसंद भी खुद नहीं चुननी पड़ती।

एल्गोरिदम चुनता है।

उसे पता है कि हमें क्या पसंद है।

कब पसंद है।

कितनी देर पसंद है।

और शायद कुछ समय बाद यह भी पता चल जाएगा कि हमें रात को सोने से पहले कौन-सी रील देखकर पछताना है।

यही डिजिटल युग की महान उपलब्धि है।

पहले इंसान अपनी इच्छाओं का मालिक था।

अब एल्गोरिदम उसका मैनेजर है।

और हम खुशी-खुशी उसके निर्देशों का पालन करते हैं।

कभी-कभी लगता है कि आधुनिक मनुष्य ने स्वतंत्रता का अर्थ ही बदल दिया है।

पहले स्वतंत्रता का मतलब था—अपनी इच्छा से जीवन जीना।

अब स्वतंत्रता का मतलब है—अपनी इच्छा से अगली रील चुनना।

और यदि रील पसंद नहीं आई तो दूसरी।

फिर तीसरी।

फिर चौथी।

फिर पता ही नहीं चलता कि रात के बारह बजे से सुबह के दो बज गए।

सुबह उठकर आदमी कहता है—

“कल नींद नहीं आई।”

भाई, नींद आई थी।

तुमने ही उसे आने नहीं दिया।

तुम्हारे हाथ में फोन था और तुम्हारे सामने पूरी दुनिया नाच रही थी।

इसलिए इंस्टाग्राम को दोष देना भी थोड़ा आसान रास्ता है। असली समस्या प्लेटफॉर्म से ज्यादा हमारी आदतों में है।

रील मनोरंजन हो सकती है, लेकिन जीवन नहीं।

किसी की खूबसूरत तस्वीर देखकर कुछ सेकंड के लिए मुस्कुराना स्वाभाविक है, लेकिन उसी स्क्रीन को जीवन की खुशी का स्थायी स्रोत मान लेना खतरनाक है।

क्योंकि स्क्रीन पर जो दिखाई देता है, वह अक्सर जीवन का संपादित संस्करण होता है।

वहाँ किसी का झगड़ा नहीं दिखता।

किसी की चिंता नहीं दिखती।

किसी की असफलता नहीं दिखती।

किसी की रातों की बेचैनी नहीं दिखती।

वहाँ केवल सबसे अच्छा फ्रेम दिखाई देता है।

और हम अपने पूरे जीवन की तुलना किसी दूसरे के सबसे अच्छे फ्रेम से करने लगते हैं।

यही आधुनिक विडंबना है।

दूसरों की जिंदगी देखने के लिए हमने दुनिया की सबसे बड़ी खिड़की बना ली, लेकिन अपनी जिंदगी देखने का समय ही नहीं बचा।

तो धन्यवाद ज़करबर्ग!

आपने हमें मनोरंजन दिया।

आपने हमें रील दी।

आपने हमें फिल्टर दिए।

आपने हमें इन्फ्लुएंसर दिए।

और सबसे बढ़कर आपने हमें यह अद्भुत भ्रम दिया कि हम दुनिया से जुड़े हुए हैं।

और अंत में,

बस एक छोटी-सी समस्या रह गई है—

दुनिया से जुड़े रहने की कोशिश में कहीं हम अपने आप से ही डिस्कनेक्ट न हो जाएँ।

इसलिए अगली बार जब जीवन बहुत भारी लगे, इंस्टाग्राम खोलने से पहले दो मिनट अपनी जिंदगी को भी देख लीजिए।

हो सकता है वहाँ कोई ऐसी कहानी चल रही हो, जिसे किसी फिल्टर, कैमरा एंगल या एल्गोरिदम की जरूरत नहीं।

और हाँ…

अगर फिर भी मन बहुत उदास हो तो रील देख लीजिए।

लेकिन समय देखकर।

क्योंकि इंस्टाग्राम की रील तीस सेकंड की होती है,

लेकिन उसका “बस एक और” कभी-कभी पूरी रात का हो जाता है।

लिखते रहेंगे…. सीतेश चौधरी

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देश बदल रहा है, व्यवस्था सुधर रही है, नेता सच बोल रहे हैं और सोशल मीडिया पर लोग शालीन हो चुके हैं। अगर आपको भी ऐसा लगता है, तो शायद आपको मेरे व्यंग्य पढ़ने की ज़रूरत है। मैं उन बातों पर लिखता हूँ जिन्हें देखकर आम आदमी सिर पकड़ लेता है और व्यवस्था प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला लेती है। मेरा उद्देश्य किसी को खुश या नाराज़ करना नहीं, बल्कि सच को हँसी के लिबास में पेश करना है। यह पेज उन लोगों के लिए है जो खबरों के बीच छिपे व्यंग्य को समझते हैं और हँसते-हँसते गंभीर बातें सोचने का साहस रखते हैं।"जहाँ तर्क थक जाता है, वहाँ व्यंग्य अपनी बात कहता है।"

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