Jantar Mantar Protest | गुंडे हैं ये, तिलचट्टे नहीं; किसी को भी देख लीजिए
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार पवित्र है, लेकिन जब आंदोलन हिंसा का पर्याय बन जाए तो सबसे पहले उसकी नैतिकता कठघरे में खड़ी होती है | Jantar Mantar Protest
सम्पादकीय: सीतेश चौधरी
Jantar Mantar Protest
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां असहमति को अपराध नहीं माना जाता। नागरिकों को अपनी बात कहने, सरकार की नीतियों का विरोध करने और जनहित के प्रश्नों पर आंदोलन करने का अधिकार संविधान ने दिया है। यही अधिकार लोकतंत्र को जीवंत बनाता है। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता केवल अधिकारों पर नहीं, बल्कि कर्तव्यों और मर्यादाओं पर भी निर्भर करती है। जब विरोध प्रदर्शन कानून की सीमाओं को लांघने लगे, सार्वजनिक व्यवस्था को चुनौती देने लगे और हिंसा का रूप धारण कर ले, तब वह केवल आंदोलन नहीं रह जाता, बल्कि समाज के लिए चिंता का विषय बन जाता है। हाल के दिनों में राष्ट्रीय राजधानी में हुए घटनाक्रम ने देश के सामने ठीक यही प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या लोकतंत्र में विरोध का अर्थ अब केवल टकराव और अराजकता रह गया है, अथवा अब भी संवाद और संवैधानिक मर्यादा उसकी आत्मा है।
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इस पूरे प्रकरण पर अनेक प्रकार के राजनीतिक दावे और प्रतिदावे सामने आए। किसी ने इसे छात्रों का स्वाभाविक आक्रोश बताया, तो किसी ने इसे सुनियोजित राजनीतिक आयोजन करार दिया। कुछ लोगों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों की अभिव्यक्ति कहा, जबकि दूसरे पक्ष ने इसे कानून और व्यवस्था पर सुनियोजित आक्रमण बताया। ऐसे समय में किसी भी सजग समाज का दायित्व केवल किसी एक पक्ष का समर्थन या विरोध करना नहीं होता, बल्कि तथ्यों, परिस्थितियों और परिणामों के आधार पर पूरे घटनाक्रम का विवेकपूर्ण मूल्यांकन करना होता है।
लोकतंत्र में आंदोलन और अराजकता के बीच की रेखा अत्यंत स्पष्ट है। जब नागरिक अपनी मांगों को शांतिपूर्ण ढंग से रखते हैं, शासन से संवाद करते हैं और संवैधानिक माध्यमों का सहारा लेते हैं, तब वह लोकतांत्रिक संघर्ष कहलाता है। किंतु जब वही आंदोलन हिंसा, तोड़फोड़, सरकारी संपत्ति की क्षति, पुलिस पर आक्रमण और भय का वातावरण उत्पन्न करने लगे, तब वह अपनी नैतिक शक्ति स्वयं खो देता है। किसी भी विचारधारा या उद्देश्य की पवित्रता हिंसा के सहारे सिद्ध नहीं की जा सकती। इतिहास साक्षी है कि जिन आंदोलनों ने समाज का व्यापक विश्वास प्राप्त किया, उन्होंने जनता का मन जीता, भय उत्पन्न नहीं किया।
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इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या यह वास्तव में छात्रों का आंदोलन था। अनेक आरोप लगाए गए कि आंदोलन में ऐसे लोगों की उपस्थिति अधिक थी, जिनका छात्र समुदाय से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था। यदि ऐसा है तो यह केवल एक राजनीतिक प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक चिंता का विषय भी है। छात्र आंदोलनों की अपनी विशिष्ट पहचान होती है। उनका उद्देश्य शैक्षणिक, सामाजिक अथवा राष्ट्रीय प्रश्नों पर विचार प्रस्तुत करना होता है। यदि उनमें बाहरी राजनीतिक समूहों का प्रभाव बढ़ने लगे, तो मूल उद्देश्य धीरे-धीरे पीछे छूट जाता है और आंदोलन किसी अन्य दिशा में मुड़ जाता है। यद्यपि ऐसे सभी आरोपों की निष्पक्ष जांच और स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, क्योंकि लोकतंत्र में केवल आरोपों के आधार पर किसी निष्कर्ष तक पहुंचना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
भारतीय राजनीति का इतिहास यह भी बताता है कि कोई भी बड़ा जनआंदोलन राजनीतिक दलों की दृष्टि से कभी दूर नहीं रहा। चाहे संपूर्ण क्रांति का आंदोलन रहा हो, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान रहा हो, किसान आंदोलन रहा हो अथवा नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में हुए प्रदर्शन, प्रत्येक अवसर पर राजनीतिक दलों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से भूमिका निभाई। इसमें कोई अस्वाभाविक बात नहीं है। राजनीति का स्वभाव ही जनभावनाओं से जुड़ना है। किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है, जब आंदोलन का नेतृत्व जनहित से अधिक राजनीतिक लाभ का माध्यम बन जाए। तब आंदोलन का उद्देश्य पीछे छूट जाता है और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा उसका केंद्र बन जाती है।
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आज विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच चल रही तीखी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने भी इस बहस को और अधिक जटिल बना दिया है। सत्ता पक्ष का आरोप है कि विपक्ष केवल सरकार का विरोध करने के लिए ऐसे आंदोलनों का समर्थन करता है, जबकि विपक्ष का कहना है कि लोकतंत्र में सरकार से प्रश्न पूछना उसका संवैधानिक दायित्व है। वस्तुतः दोनों पक्ष लोकतंत्र के अनिवार्य अंग हैं। सरकार का दायित्व शासन चलाना है और विपक्ष का दायित्व शासन की समीक्षा करना। किंतु यदि दोनों पक्ष अपनी राजनीतिक सीमाओं का अतिक्रमण कर केवल एक-दूसरे को पराजित करने की मानसिकता में उतर जाएं, तो लोकतंत्र का सबसे बड़ा नुकसान जनता को उठाना पड़ता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक विचार विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है कि भारत में वास्तविक परिवर्तन सड़कों पर नहीं, बल्कि मतदान केंद्रों पर होता है। लोकतंत्र का सबसे बड़ा आंदोलन चुनाव है। प्रत्येक नागरिक का मत ही अंतिम निर्णय देता है कि कौन शासन करेगा और कौन विपक्ष में बैठेगा। यदि जनता किसी सरकार से असंतुष्ट होती है तो वह उसे सत्ता से बाहर का मार्ग दिखाती है। यदि संतुष्ट होती है तो पुनः अवसर प्रदान करती है। इसलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतपत्र का महत्व किसी भी नारे या प्रदर्शन से कहीं अधिक है। यह भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।
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हालांकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि जनाक्रोश केवल सड़कों पर दिखाई देता है। अनेक बार जनता की नाराजगी मौन रहती है और उसका परिणाम चुनावों में सामने आता है। कभी वह सामाजिक विमर्श के रूप में प्रकट होती है, तो कभी स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे आंदोलनों के माध्यम से। इसलिए किसी भी आंदोलन की सफलता अथवा असफलता का आकलन केवल भीड़ की संख्या से नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में जनमत का स्वरूप बहुआयामी होता है।
यदि किसी प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों पर हमला हुआ है, पत्थरबाजी हुई है अथवा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया है, तो यह निस्संदेह गंभीर अपराध है। कानून किसी भी व्यक्ति को हिंसा का अधिकार नहीं देता। चाहे वह किसी भी विचारधारा, संगठन या राजनीतिक दल से जुड़ा हो। किंतु इसी के साथ यह सिद्धांत भी उतना ही आवश्यक है कि निर्दोष नागरिकों को केवल भीड़ का हिस्सा होने के कारण अपराधी घोषित नहीं किया जा सकता। प्रत्येक मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषी तथा निर्दोष के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए। न्याय तभी सार्थक होता है जब वह निष्पक्ष दिखाई भी दे।
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इस पूरे घटनाक्रम से सबसे बड़ी सीख युवाओं के लिए निकलती है। आज का युवा ऊर्जा, उत्साह और परिवर्तन की इच्छा से भरा हुआ है। यही ऊर्जा राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी पूंजी है। किंतु यदि यही ऊर्जा बिना विवेक के भीड़ की दिशा में बहने लगे, तो उसका परिणाम केवल व्यक्तिगत और सामाजिक क्षति के रूप में सामने आता है। किसी भी आपराधिक प्रकरण में नाम आने का प्रभाव केवल वर्तमान तक सीमित नहीं रहता। प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार, विदेश में शिक्षा और सार्वजनिक जीवन तक उसका प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए प्रत्येक युवा को किसी भी आंदोलन में सम्मिलित होने से पहले उसके उद्देश्य, नेतृत्व, कार्यप्रणाली और संभावित परिणामों को भलीभांति समझ लेना चाहिए।
सामाजिक माध्यमों के विस्तार ने राजनीति और जनमत दोनों की प्रकृति बदल दी है। आज प्रत्येक घटना का चित्र और दृश्य कुछ ही क्षणों में देशभर में पहुंच जाता है। इससे पारदर्शिता बढ़ी है, किंतु भ्रम भी बढ़ा है। अधूरे दृश्य, संदर्भ से काटे गए प्रसंग, पुराने चित्रों को नए घटनाक्रम से जोड़ देना और भ्रामक सूचनाओं का प्रसार अब सामान्य बात हो गई है। ऐसे समय में किसी भी समाचार पर तुरंत विश्वास करने के बजाय विश्वसनीय स्रोतों और आधिकारिक जानकारी की प्रतीक्षा करना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। सूचना का युग जितना अवसर लेकर आया है, उतनी ही बड़ी चुनौती भी साथ लाया है।
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केंद्र सरकार अपने कार्यकाल की उपलब्धियों के रूप में अनेक जनकल्याणकारी योजनाओं का उल्लेख करती रही है। स्वास्थ्य, जल, विद्युत, सड़क और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में किए गए कार्यों को उसकी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। दूसरी ओर विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी, कृषि संकट, आर्थिक विषमता और अन्य विषयों पर लगातार प्रश्न उठाता है। यही लोकतांत्रिक संतुलन है। सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाती है, विपक्ष उसकी कमियों की ओर संकेत करता है और अंततः जनता दोनों का मूल्यांकन करती है। लोकतंत्र में अंतिम निर्णय किसी मंच या सड़क पर नहीं, बल्कि मतदाता के विवेक से होता है।
इतिहास यह भी बताता है कि कोई भी आंदोलन तभी व्यापक सफलता प्राप्त करता है, जब समाज का विश्वास उसके साथ जुड़ जाए। केवल नारों और उत्तेजना से परिवर्तन नहीं आते। परिवर्तन तब आते हैं, जब जनता यह अनुभव करे कि आंदोलन उसके जीवन, उसके अधिकारों और उसके भविष्य के लिए आवश्यक है। यदि समाज स्वयं दूरी बनाए रखे, तो किसी भी आंदोलन को आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर जनता उसके साथ क्यों नहीं खड़ी हुई।
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हिंसा कभी भी किसी विचारधारा की विजय का माध्यम नहीं बन सकती। विचारों की लड़ाई विचारों से ही जीती जाती है। लोकतंत्र में सबसे प्रभावशाली अस्त्र तर्क, संवाद और मतदान हैं। जो आंदोलन हिंसा का मार्ग अपनाता है, वह अपने उद्देश्य को स्वयं कमजोर कर देता है। समाज ऐसे आंदोलनों के प्रति सहानुभूति खो देता है और उनका नैतिक आधार समाप्त हो जाता है। इसलिए लोकतांत्रिक संघर्ष की सबसे बड़ी शक्ति संयम और संवैधानिक आचरण में निहित है।
युवाओं को राजनीति से विमुख होने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि राजनीति को समझने की आवश्यकता है। राष्ट्र निर्माण में जागरूक नागरिक की भूमिका किसी भी दल के अंध समर्थक से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है। संविधान, शासन व्यवस्था, सार्वजनिक नीति और राष्ट्रीय हितों की समझ रखने वाला युवा लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति बन सकता है। किंतु यदि वह केवल भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाए, तो उसका भविष्य भी संकट में पड़ता है और लोकतंत्र भी कमजोर होता है।
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अंततः यह स्वीकार करना होगा कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति जनता है। सरकारें जनता बनाती हैं और जनता ही उन्हें बदलती भी है। किसी भी नेता, दल अथवा आंदोलन से ऊपर यदि कोई शक्ति है, तो वह जागरूक मतदाता की शक्ति है। इसलिए लोकतंत्र का भविष्य न तो हिंसा में सुरक्षित है, न ही उग्र नारों में। उसका भविष्य केवल संविधान, संवाद, कानून के सम्मान और जनमत की गरिमा में निहित है।
समापन टिप्पणी
जंतर-मंतर से जुड़ा यह पूरा विवाद केवल एक दिन की घटना नहीं है। यह हमारे लोकतंत्र के सामने खड़े उन प्रश्नों का प्रतीक है, जिनका उत्तर आज नहीं तो कल देना ही होगा। क्या विरोध का अर्थ कानून को चुनौती देना है? क्या राजनीतिक स्वार्थ जनआंदोलनों की दिशा तय करेंगे? क्या युवा अपनी ऊर्जा को विवेक के साथ जोड़ पाएंगे? और क्या लोकतंत्र संवाद की संस्कृति को पुनः स्थापित कर पाएगा? इन प्रश्नों का उत्तर किसी एक दल या विचारधारा के पास नहीं है। इसका उत्तर पूरे समाज को मिलकर खोजना होगा। यदि लोकतंत्र को सशक्त बनाना है, तो विरोध भी संवैधानिक होना चाहिए और शासन भी उत्तरदायी। यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है और यही भारत की लोकतांत्रिक परंपरा का वास्तविक स्वरूप भी।





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