Left Ideology | विचारधारा बड़ी या मां-बाप? नई पीढ़ी का ‘लेफ्ट’ कन्फ्यूजन
मुझे नहीं पता कि इस विषय को नैरेट कैसे किया जाए। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें लिखने बैठो तो शब्द पहले हंसते हैं, फिर शर्माते हैं और अंत में लेखक को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं।
मैं भी आज कुछ ऐसा ही लिखने बैठा हूं।
मामला विचारधारा का है।
वही विचारधारा, जिसके लिए आदमी किताबें पढ़ता है, बहस करता है, सोशल मीडिया पर लड़ता है, क्रांति के पोस्टर लगाता है और कभी-कभी दुर्भाग्य से अपने घर के दरवाजे भी बंद कर देता है।
क्योंकि दुनिया बदलनी है।
और दुनिया बदलने की इस महान परियोजना में सबसे पहले अपना घर बदलना जरूरी समझ लिया जाता है।
Left Ideology
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मुझे पियूष मिश्रा का वह पुराना इंटरव्यू याद आता है, जिसमें उन्होंने अपने जीवन के एक ऐसे दौर की बात की थी, जब विचारधारा और व्यक्तिगत जीवन के बीच की दूरी इतनी बढ़ गई थी कि परिवार के प्रति जिम्मेदारियां भी बोझ जैसी लगने लगी थीं।
उनकी बातों में सबसे ज्यादा जो चीज मुझे चुभी, वह उनकी विचारधारा नहीं थी।
वह उनका पछतावा था।
वह बेचैनी थी जो किसी पुरस्कार समारोह में नहीं मिलती, किसी किताब के विमोचन में नहीं मिलती और किसी क्रांतिकारी भाषण में तो बिल्कुल नहीं मिलती।
वह बेचैनी तब पैदा होती है जब आदमी पीछे मुड़कर देखता है और पाता है कि जिस दुनिया को बदलने निकला था, उस रास्ते में उसने अपने सबसे अपने लोगों को ही कहीं पीछे छोड़ दिया।
और मां-बाप तो वैसे भी अजीब प्राणी हैं।
आप उनसे असहमत हो सकते हैं।
उनकी राजनीति पसंद नहीं कर सकते।
उनकी सोच आपको पिछड़ी हुई लग सकती है।
आप उन्हें व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का प्रोफेसर घोषित कर सकते हैं।
लेकिन जब रात के दो बजे आपको बुखार होता है, तब वे आपकी विचारधारा नहीं पूछते।
मां यह नहीं पूछती कि बेटा, तुम्हारा स्टैंड मार्क्स के किस अध्याय से प्रभावित है?
वह बस माथा छूकर कहती है—दवा ली?
पिता यह नहीं कहते कि तुम्हारी बीमारी के प्रति मेरा दृष्टिकोण वर्ग-संघर्ष की कसौटी पर क्या है।
वह चुपचाप डॉक्टर के पास ले जाते हैं।
यही परिवार की सबसे बड़ी समस्या है।
परिवार बहुत व्यावहारिक संस्था है।
वह आपके वैचारिक भाषणों से प्रभावित नहीं होता।
वह पूछता है—खाना खाया?
और शायद यही सवाल आधुनिक क्रांतिकारी को सबसे ज्यादा परेशान करता है।
क्योंकि इसका कोई वैचारिक उत्तर नहीं होता।
अब आइए नई पीढ़ी की तरफ।
नई पीढ़ी ने विचारधारा को बहुत सुविधाजनक बना दिया है।
पहले लोग विचारधारा पढ़ते थे।
अब लोग विचारधारा पहनते हैं।
पहले विचारधारा के लिए किताबें पढ़नी पड़ती थीं।
अब दो रील, तीन उद्धरण और चार इंस्टाग्राम स्टोरी काफी हैं।
पहले क्रांति के लिए संगठन बनते थे।
अब क्रांति के लिए हैशटैग बनते हैं।
और सबसे अच्छी बात यह है कि क्रांति के बीच में मोबाइल की बैटरी खत्म हो जाए तो पूरी क्रांति स्थगित हो जाती है।
Left Ideology
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इसी संदर्भ में जब मैं नेहा बोरा जैसे युवा चेहरों को देखता हूं, तो मुझे हमारे समय की एक अजीब बेचैनी दिखाई देती है।
यहां फिर स्पष्ट कर दूं—मैं किसी व्यक्ति के निजी जीवन का फैसला सुनाने नहीं बैठा हूं। मैं केवल सार्वजनिक रूप से सामने आए विचारों और घटनाओं को देखकर अपनी व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया लिख रहा हूं।
किसी के पिता से मतभेद हैं?
होने दीजिए।
परिवार से विचार अलग हैं?
बिल्कुल हो सकते हैं।
विचारों की स्वतंत्रता का मतलब यही तो है।
लेकिन मेरे छोटे से दिमाग में एक सवाल बार-बार घूमता है—
क्या किसी विचारधारा की अंतिम परीक्षा यह है कि वह आपको अपने पिता से बात न करने के लिए भी मानसिक रूप से आराम दे दे?
अगर उत्तर हां है, तो फिर मामला विचारधारा से थोड़ा आगे निकल चुका है।
यहां समस्या वाम या दक्षिण की नहीं है।
समस्या उस मानसिकता की है जिसमें विचार पहले इंसान को परिभाषित करता है और रिश्ते बाद में।
एक समय था जब लोग कहते थे—
“मेरे पिता मुझसे असहमत हैं।”
अब कुछ लोग शायद गर्व से कहते हैं—
“मेरे पिता मुझसे असहमत हैं।”
जैसे यह कोई वैचारिक उपलब्धि हो।
भाई, पिता से असहमति कोई मेडल नहीं है।
और पिता से सहमति भी कोई प्रमाणपत्र नहीं है।
वह आपके पिता हैं।
आप दोनों एक-दूसरे से असहमत होकर भी एक-दूसरे से प्रेम कर सकते हैं।
लेकिन आजकल लगता है कि असहमति का मतलब ही संबंध-विच्छेद हो गया है।
तुम मेरे विचार से सहमत नहीं?
ब्लॉक।
तुम मेरी राजनीति पसंद नहीं करते?
अनफॉलो।
तुमने मेरे नेता की आलोचना कर दी?
रिश्ता खत्म।
और अगर तुम मेरे पिता हो और तुम्हारी विचारधारा मेरी विचारधारा से मेल नहीं खाती, तो फिर तो दस साल का साइलेंस भी क्रांतिकारी उपलब्धि माना जा सकता है।
वाह!
क्रांति सफल हुई।
साम्राज्यवाद पर विजय मिल गई।
बस घर में पिता अकेले बैठे हैं।
लेकिन कोई बात नहीं।
क्योंकि इंस्टाग्राम पर क्रांति जारी है।
मुझे इस पूरे प्रकरण में सबसे दिलचस्प चीज यही लगती है कि हम दूसरों की स्वतंत्रता के बहुत बड़े समर्थक हैं, लेकिन अपने परिवार की स्वतंत्रता से असहज हो जाते हैं।
Left Ideology
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हम चाहते हैं कि समाज हमें हमारे विचार रखने की पूरी आजादी दे।
लेकिन पिता को अपनी राय रखने की आजादी मिले, यह बात कभी-कभी हमारे वैचारिक संविधान में फुटनोट में भी नहीं मिलती।
यह कैसी स्वतंत्रता है?
मैं बोलूं तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
पिता बोलें तो सामंती मानसिकता।
मैं सवाल करूं तो लोकतंत्र।
पिता सवाल करें तो पिछड़ी सोच।
मैं असहमति जताऊं तो क्रांतिकारी चेतना।
पिता असहमति जताएं तो—“आप समझते नहीं हैं।”
वाह रे विचारधारा!
तूने लोकतंत्र को इतना लोकतांत्रिक बनाया कि घर में सिर्फ एक वोट बचा।
मेरा।
और यह समस्या केवल किसी एक विचारधारा के साथ नहीं है।
दक्षिणपंथी कट्टरता भी उतनी ही खतरनाक है।
धर्म के नाम पर परिवार से संबंध तोड़ना भी मूर्खता है।
जाति के नाम पर रिश्ते तोड़ना भी मूर्खता है।
राजनीति के नाम पर मां-बाप को त्याग देना भी मूर्खता है।
क्योंकि अंततः विचारधारा इंसान के लिए है।
इंसान विचारधारा के लिए नहीं।
लेकिन आजकल उल्टा हो गया है।
हमने विचारधाराओं को इंसानों से बड़ा बना दिया।
अब आदमी पहले तय करता है कि सामने वाला किस खांचे में है और उसके बाद तय करता है कि उससे प्रेम करना है या नफरत।
पहले पिता थे।
अब पिता की राजनीतिक विचारधारा है।
पहले दोस्त था।
अब दोस्त की वैचारिक लोकेशन है।
पहले प्रेम था।
अब प्रेमी की राजनीतिक संबद्धता है।
पहले परिवार था।
अब परिवार एक वैचारिक युद्धभूमि है।
और फिर हम पूछते हैं कि समाज में ध्रुवीकरण क्यों बढ़ रहा है?
भाई, ध्रुवीकरण संसद से पहले ड्राइंग रूम में पहुंच चुका है।
एक तरफ पिता टीवी देख रहे हैं।
दूसरी तरफ बेटा मोबाइल पर क्रांति देख रहा है।
पिता कहते हैं—“बेटा, खाना खा ले।”
बेटा कहता है—“पापा, आप फासीवादी ढांचे का हिस्सा हैं।”
पिता चुप हो जाते हैं।
रसोई में मां सोचती है—
“दोनों को दाल दे दूं या पहले विचारधारा पूछूं?”
यही हमारा नया पारिवारिक लोकतंत्र है।
और फिर आता है सोशल मीडिया।
सोशल मीडिया ने हमें यह भ्रम दे दिया है कि दुनिया हमारे कमेंट से चलती है।
किसी ने किसी की तस्वीर के नीचे किसी कैदी की रिहाई की मांग कर दी।
किसी ने किसी नेता के समर्थन में पोस्ट कर दिया।
किसी ने किसी आंदोलन के साथ तस्वीर लगा ली।
और हमें लगता है कि इतिहास की दिशा बदल गई।
इतिहास बेचारा कोने में बैठा सोच रहा है—
“भाई, पहले मुझे पढ़ तो लो।”
लेकिन नहीं।
हमें पढ़ना नहीं है।
हमें प्रतिक्रिया देनी है।
हमें समझना नहीं है।
हमें पक्ष चुनना है।
हमें संवाद नहीं करना है।
हमें घोषणा करनी है।
यही नई राजनीतिक संस्कृति का सबसे बड़ा संकट है।
Left Ideology
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विचारधारा अब संवाद की शुरुआत नहीं, संवाद का अंत बनती जा रही है।
आप मेरे विचार से सहमत नहीं हैं?
तो बातचीत खत्म।
आप मेरे पिता हैं और मेरे विचार से सहमत नहीं हैं?
तो बातचीत दस साल के लिए खत्म।
और फिर हम कहते हैं कि समाज में संवाद क्यों नहीं बचा?
संवाद कैसे बचेगा?
जब हर असहमति को चरित्र प्रमाणपत्र बना दिया जाए तो संवाद मरना ही है।
मुझे पियूष मिश्रा की बात इसलिए याद आती है क्योंकि पछतावा आदमी को बहुत कुछ सिखाता है।
वह बताते हैं कि जीवन पीछे जाकर एडिट नहीं किया जा सकता।
युवा अवस्था में हम जिस चीज को क्रांति समझते हैं, हो सकता है पचास की उम्र में वही चीज हमें अधूरापन लगे।
और यह जरूरी नहीं कि हर युवा अपनी विचारधारा छोड़ दे।
बिल्कुल नहीं।
विचार बदलना कमजोरी नहीं है।
विचार पर टिके रहना भी अपराध नहीं है।
लेकिन एक बात जरूर याद रखनी चाहिए—
अपने विचारों की मजबूती का सबसे बड़ा प्रमाण यह नहीं है कि आप अपने विरोधी से नफरत कर सकें।
बल्कि यह है कि आप उससे असहमत होकर भी उसे इंसान मान सकें।
और अगर वह आपका पिता है, तो शायद उससे बहस करने के बाद भी उसके पैर दबा सकें।
अगर वह आपकी मां है, तो उसके राजनीतिक ज्ञान पर हंसने के बाद भी उसके हाथ की चाय पी सकें।
यही शायद असली क्रांति है।
बाकी क्रांति तो कैमरे के सामने बहुत आसान है।
माइक उठाइए।
भाषण दीजिए।
पोस्ट डालिए।
हैशटैग लगाइए।
तस्वीर खिंचाइए।
और फिर घर जाकर मां से कहिए—
“मां, खाना लगा दो।”
मां पूछे—
“बेटा, आज क्या क्रांति की?”
बेटा बोले—
“मां, आज बहुत बड़ा सिस्टम हिला दिया।”
मां चुपचाप प्लेट में दो रोटी और रख दे।
क्योंकि मां जानती है—
बेटा सिस्टम नहीं हिलाता।
उसे भूख हिलाती है।
और शायद यही वह ज्ञान है जिसे कोई विचारधारा पूरी तरह नहीं समझ सकती।
मुझे नहीं पता कि भविष्य की राजनीति किस दिशा में जाएगी।
Left Ideology मजबूत होगी या कमजोर।
दक्षिण मजबूत होगा या कोई नया विचार जन्म लेगा।
लेकिन मेरी छोटी-सी इच्छा है कि अगली पीढ़ी कम से कम इतना जरूर सीखे कि विचारों की लड़ाई लड़ते-लड़ते रिश्तों की हत्या करना कोई महान उपलब्धि नहीं है।
अपने पिता से असहमति रखिए।
उनसे बहस कीजिए।
उनके तर्कों की धज्जियां उड़ाइए।
वे भी आपकी धज्जियां उड़ाएं।
घर में लोकतंत्र जिंदा रखिए।
लेकिन दरवाजा बंद मत कीजिए।
क्योंकि विचारधारा बदलने के लिए आपके पास पूरी जिंदगी है।
लेकिन मां-बाप के साथ बीता समय रिपीट टेलीकास्ट में नहीं आता।
और अंत में,
उन तमाम क्रांतिकारियों के लिए मेरी ओर से एक ही संदेश है—
अगर आपके पास पूरी दुनिया को बदलने की योजना है, तो बहुत अच्छी बात है।
बस एक बार घर फोन कर लेना।
हो सकता है उधर कोई बूढ़ा पिता अभी भी फोन की घंटी सुनकर यही सोच रहा हो—
“शायद बेटा आज बात करेगा।”
और अगर दस साल से फोन नहीं किया है तो कोई बात नहीं।
क्रांति थोड़ी देर रोक दीजिए।
पहले घर जाइए।
पिता से मिलिए।
बहस कीजिए।
गुस्सा कीजिए।
रो लीजिए।
फिर वापस आकर दुनिया बदल लीजिए।
क्योंकि दुनिया बदलने से पहले अगर अपना घर ही उजाड़ दिया, तो इतिहास आपको क्रांतिकारी कहेगा या नहीं, पता नहीं।
लेकिन मां की रसोई में आपका कमरा जरूर खाली रह जाएगा।
और वह खाली कमरा किसी भी विचारधारा की सबसे बड़ी हार होगा।
बाकी हम तो बस यही कह सकते हैं—
गेट वेल सून, विचारधारा!
इंसानियत अभी अस्पताल में भर्ती है।





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