Mithila Lok Utsav Piprahi | पिपराही में मिथिला लोक उत्सव का भव्य समापन, ‘रसप्रिया’ और ‘सारी रात’ ने दर्शकों को किया भावविभोर
तीन दिवसीय सांस्कृतिक महोत्सव के अंतिम दिन लोक संस्कृति, रंगमंच और मानवीय संवेदनाओं का हुआ अद्भुत संगम | Mithila Lok Utsav Piprahi
लदनिया। मिथिला की समृद्ध लोक संस्कृति, लोकभाषा और रंगमंच की गौरवशाली परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से आयोजित तीन दिवसीय मिथिला लोक उत्सव का भव्य समापन पिपराही स्थित गायत्री विवाह भवन में हुआ। सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था आदर्श महिला मंडल लड़ुगामा द्वारा आयोजित इस महोत्सव का आयोजन संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं प्रस्तुति अनुदान योजना के अंतर्गत किया गया।
समापन दिवस पर दो महत्वपूर्ण नाटकों ‘रसप्रिया’ तथा ‘सारी रात’ का प्रभावशाली मंचन किया गया। दोनों प्रस्तुतियों ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। कलाकारों के अभिनय, संगीत, प्रकाश संयोजन और निर्देशन की भरपूर सराहना हुई।

मुख्य बातें | Mithila Lok Utsav Piprahi
- तीन दिवसीय मिथिला लोक उत्सव का हुआ सफल समापन।
- अंतिम दिन दो चर्चित नाटकों का मंचन।
- लोक संस्कृति और आधुनिक जीवन के द्वंद्व को मंच पर उतारा गया।
- बड़ी संख्या में पहुंचे दर्शक।
- कलाकारों को मिली जोरदार सराहना।
- संस्था ने भविष्य में भी ऐसे आयोजनों का लिया संकल्प।
कार्यक्रम एक नजर में | Mithila Lok Utsav Piprahi
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| आयोजन स्थल | गायत्री विवाह भवन, पिपराही |
| आयोजन | आदर्श महिला मंडल लड़ुगामा |
| सहयोग | संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार |
| अवसर | तीन दिवसीय मिथिला लोक उत्सव |
| अंतिम दिन | रसप्रिया एवं सारी रात नाटक |
| निर्देशक | सुश्री स्तुति कुमारी |
‘रसप्रिया’ ने जीवंत कर दी मिथिला की लोक आत्मा | Mithila Lok Utsav Piprahi
समापन दिवस का पहला आकर्षण रहा प्रसिद्ध साहित्यकार फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ द्वारा रचित अमर नाट्यकृति ‘रसप्रिया’।
यह केवल एक नाटक नहीं था, बल्कि मिथिला की मिट्टी की सुगंध, लोकगीतों की मिठास और लोक कलाकारों के संघर्ष की संवेदनशील प्रस्तुति थी।
जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ी, पूरा सभागार भावनाओं से भर उठा।

पंचकौड़ी मिरदंगिया की पीड़ा ने दर्शकों को किया भावुक | Mithila Lok Utsav Piprahi
नाटक की कहानी प्रसिद्ध लोक कलाकार पंचकौड़ी मिरदंगिया के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है।
एक समय वह मिथिला के प्रसिद्ध लोक कलाकार थे।
विद्यापति पदों के अद्भुत गायक।
लोकनाट्य परंपरा के सशक्त प्रतिनिधि।
लेकिन समय बदला।
लोककला का सम्मान कम होने लगा।
कलाकार उपेक्षा का शिकार होने लगे।
गरीबी, अकेलापन और संघर्ष उनके जीवन का हिस्सा बन गया।
इन्हीं परिस्थितियों को मंच पर अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया।
नई पीढ़ी में दिखी उम्मीद की किरण | Mithila Lok Utsav Piprahi
नाटक में एक प्रतिभाशाली बालक की एंट्री कहानी को नया मोड़ देती है।
उसकी मधुर आवाज सुनकर मिरदंगिया अपने सुनहरे दिनों को याद करते हैं।
उन्हें लगता है कि लोक संगीत की नई यात्रा शुरू हो सकती है।
लेकिन बदलते सामाजिक परिवेश और आर्थिक कठिनाइयों के कारण उनका सपना अधूरा रह जाता है।
यही संघर्ष पूरे नाटक का सबसे भावुक पक्ष बनकर सामने आया।
लोक संस्कृति संरक्षण का दिया संदेश | Mithila Lok Utsav Piprahi
‘रसप्रिया’ केवल एक कलाकार की कहानी नहीं है।
यह उन हजारों लोक कलाकारों की आवाज है जो अपनी संस्कृति को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
नाटक ने यह संदेश दिया कि यदि लोक संस्कृति को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से कट जाएंगी।

मिथिला की लोक संस्कृति का अद्भुत चित्रण | Mithila Lok Utsav Piprahi
नाटक में मिथिला की पहचान हर दृश्य में दिखाई दी।
लोकभाषा।
लोकगीत।
विद्यापति संगीत।
ग्रामीण परिवेश।
पारंपरिक जीवन।
इन सभी तत्वों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
मुख्य भूमिका में मिथिलेश कुमार मैथिल ने प्रभावशाली अभिनय किया।
‘सारी रात’ ने सोचने पर किया मजबूर | Mithila Lok Utsav Piprahi
समारोह का दूसरा आकर्षण रहा प्रसिद्ध रंगकर्मी बादल सरकार द्वारा लिखित नाटक ‘सारी रात’।
यह मनुष्य के भीतर चल रहे संघर्ष, दांपत्य संबंधों की जटिलता और जीवन के गहरे प्रश्नों को सामने लाने वाला नाटक है।
एक रात की कहानी में छिपे कई जीवन दर्शन | Mithila Lok Utsav Piprahi
नाटक की शुरुआत एक पति-पत्नी से होती है।
दोनों यात्रा के दौरान रास्ता भटक जाते हैं।
रात गहराती जाती है।
वे एक सुनसान स्थान पर पहुंचते हैं।
यहीं उनकी मुलाकात एक रहस्यमय वृद्ध से होती है।
वृद्ध उन्हें अपने आश्रय में रात बिताने का निमंत्रण देता है।
इसके बाद शुरू होता है संवादों का ऐसा सिलसिला जो दर्शकों को भीतर तक झकझोर देता है।

वृद्ध पात्र बना आत्मचेतना का प्रतीक | Mithila Lok Utsav Piprahi
नाटक में वृद्ध केवल एक व्यक्ति नहीं है।
वह अनुभव का प्रतीक है।
वह विवेक का प्रतीक है।
वह आत्ममंथन का प्रतीक है।
उसकी बातें पति-पत्नी को अपने जीवन, संबंधों और मूल्यों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं।
कलाकारों ने अभिनय से जीता दिल | Mithila Lok Utsav Piprahi
पति की भूमिका में राहुल झा ने सशक्त अभिनय किया।
पत्नी की भूमिका में रानीजी ने प्रभावशाली प्रस्तुति दी।
वृद्ध की भूमिका में अविनाश झा ने दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी।
तीनों कलाकारों के संवादों ने सभागार को लंबे समय तक बांधे रखा।
संगीत और तकनीकी पक्ष भी रहा शानदार | Mithila Lok Utsav Piprahi
दोनों नाटकों में संगीत ने भावनाओं को और अधिक प्रभावशाली बनाया।
गीत-संगीत का दायित्व संजय कुमार मिश्रा तथा राहुल मनीष ने संभाला।
प्रकाश परिकल्पना विनय कुमार की रही।
तकनीकी सहयोग अर्जुन राय, केशव तथा रेमो ने दिया।
सूत्रधार के रूप में मिथिलेश कुमार मैथिल ने पूरे कार्यक्रम को प्रभावशाली ढंग से आगे बढ़ाया।
कैमरे की जिम्मेदारी देवेंद्र तथा रामपूजन ने संभाली।
मंच संचालन उपेंद्र पासवान ने किया।
दोनों नाटकों का रूपांतरण, परिकल्पना एवं निर्देशन सुश्री स्तुति कुमारी ने किया, जिसकी दर्शकों ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की।
अध्यक्ष ने कही प्रेरणादायक बात | Mithila Lok Utsav Piprahi
समापन समारोह को संबोधित करते हुए संस्था के अध्यक्ष रवि रंजन कुमार ने कहा—
“यह उत्सव केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा, बल्कि मिथिला की लोक संस्कृति, लोक कला, लोकगीत, लोकनृत्य और परंपराओं के संरक्षण का सशक्त अभियान बन गया है।”
उन्होंने कहा कि तीन दिनों में लोक संस्कृति के विविध रंग एक मंच पर दिखाई दिए।
नई पीढ़ी की भागीदारी यह बताती है कि मिथिला की सांस्कृतिक विरासत आज भी जीवंत है।
उन्होंने सभी कलाकारों, प्रशिक्षकों, स्वयंसेवकों, आयोजन समिति तथा दर्शकों का आभार व्यक्त किया।
उन्होंने भविष्य में भी ऐसे आयोजनों को लगातार जारी रखने का संकल्प दोहराया।

संस्कृति बचाने का सामूहिक संकल्प | Mithila Lok Utsav Piprahi
रवि रंजन कुमार ने कहा कि आधुनिकता के इस दौर में अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।
यदि समाज अपनी जड़ों से जुड़ा रहेगा तो हमारी सांस्कृतिक विरासत सदैव सुरक्षित रहेगी।
उन्होंने कहा कि संस्था आगे भी लोक उत्सव, कार्यशालाएं, नाट्य मंचन और प्रशिक्षण शिविर आयोजित करती रहेगी ताकि नए कलाकार तैयार हों और मिथिला की संस्कृति को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल सके।
तीन दिवसीय मिथिला लोक उत्सव केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह लोककला, लोकभाषा, लोकसंगीत और रंगमंच के संरक्षण का एक प्रभावी अभियान बनकर सामने आया। अंतिम दिन प्रस्तुत किए गए ‘रसप्रिया’ और ‘सारी रात’ ने यह सिद्ध कर दिया कि यदि समाज अपनी सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ा रहे तो परंपराएं कभी समाप्त नहीं होतीं। पिपराही की यह सांस्कृतिक संध्या लंबे समय तक दर्शकों की स्मृतियों में जीवित रहेगी।

0 Comments