Political Polarization in India | योगी ने ‘काकरोचों’ का नाश शुरू किया? झारखंड तक पहुंची राजनीतिक लड़ाई, सड़क पर कौन और संसद में कौन?
पत्रकार: सीतेश चौधरी, मुख्य संपादक, KDN
आंदोलन लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन उसकी दिशा कौन तय करेगा? | Political Polarization in India
भारतीय राजनीति में आंदोलन कोई नई परंपरा नहीं है। सत्ता के विरुद्ध आवाज उठाना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। सरकार की नीतियों पर सवाल करना नागरिक अधिकार है। सड़क पर उतरकर अपनी मांग रखना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का ही हिस्सा है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब किसी आंदोलन की पहचान उसके मूल मुद्दे से अधिक उसमें दिखाई देने वाले राजनीतिक चेहरों से होने लगे। तब सवाल केवल आंदोलन की मांग का नहीं रहता। सवाल उसकी नीयत, दिशा और राजनीतिक उपयोग का भी बन जाता है।
आज भारतीय राजनीति इसी संवेदनशील मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। एक तरफ युवा हैं, जो शिक्षा, रोजगार, परीक्षा, विश्वविद्यालय और भविष्य से जुड़े सवालों को लेकर सड़क पर उतर रहे हैं। दूसरी तरफ ऐसे राजनीतिक चेहरे भी दिखाई देते हैं, जिनकी पुरानी राजनीतिक पृष्ठभूमि वर्तमान आंदोलन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है। यही वह संदर्भ है, जिसमें उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था की राजनीति, दिल्ली के जंतर-मंतर से जुड़े विवाद, झारखंड के छात्र आंदोलन और तथाकथित ‘टुकड़े-टुकड़े गिरोह’ की बहस एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती है।
लेकिन इस पूरे विवाद को समझने के लिए उत्तेजक भाषा से आगे जाना होगा। असली प्रश्न यह है कि क्या भारतीय राजनीति सड़क और संसद के बीच एक नई टकराहट की ओर बढ़ रही है? क्या आंदोलन अब केवल जनमुद्दों की अभिव्यक्ति नहीं रह गए हैं? क्या राजनीतिक दल और उनके समर्थक आंदोलनों को अपने व्यापक संघर्ष का माध्यम बनाने लगे हैं? और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में आम नागरिक कहां खड़ा है?
योगी की राजनीति और कानून-व्यवस्था का कठोर चेहरा | Political Polarization in India
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार की राजनीति की सबसे प्रमुख पहचान कानून-व्यवस्था को लेकर उसके कठोर रुख से बनी है। अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई, अवैध निर्माण पर कार्रवाई, अवैध कब्जों को हटाने की मुहिम और प्रशासनिक तंत्र के आक्रामक इस्तेमाल ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को एक अलग स्वर दिया है। सरकार के समर्थक इसे कानून के शासन की स्थापना के रूप में देखते हैं। विरोधी इसे सत्ता की कठोरता और प्रशासनिक शक्ति के अत्यधिक इस्तेमाल के रूप में देखते हैं।
यही राजनीतिक विभाजन उत्तर प्रदेश की राजनीति को लंबे समय से प्रभावित करता रहा है। किसी कथित अपराधी के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई को भी इसी व्यापक राजनीतिक दृष्टिकोण के संदर्भ में देखा जाता है। लेकिन यहां लोकतंत्र की एक बुनियादी सीमा को समझना जरूरी है। किसी व्यक्ति पर गंभीर अपराध का आरोप लगना और न्यायालय द्वारा उसका अपराध सिद्ध होना एक बात नहीं है। दोनों के बीच कानून और न्यायिक प्रक्रिया की पूरी दूरी मौजूद है।
पुलिस कार्रवाई आवश्यक हो सकती है। अपराध के विरुद्ध कठोर कदम भी आवश्यक हो सकते हैं। लेकिन न्यायिक प्रक्रिया का महत्व उससे कम नहीं हो सकता। लोकतंत्र की असली शक्ति इसी संतुलन में है। कानून अपराध पर कार्रवाई करे, लेकिन आरोप को ही अंतिम सत्य न मान लिया जाए। यही अंतर लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था और भीड़ के न्याय के बीच की सबसे महत्वपूर्ण रेखा है।
अपराधी की पहचान और आंदोलनकारी की पहचान को अलग रखना होगा | Political Polarization in India
किसी आंदोलन में यदि ऐसे लोग शामिल होते हैं, जिनका आपराधिक अतीत है, तो यह निश्चित रूप से गंभीर प्रश्न है। लेकिन इसका उत्तर भी कानून के भीतर ही खोजा जाना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति ने अपराध किया है, तो उसके अपराध के आधार पर उसके विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए। उसे आंदोलन में शामिल होने के कारण अपराधी नहीं माना जा सकता।
इसके साथ दूसरी स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि कोई नागरिक शांतिपूर्ण तरीके से किसी आंदोलन में शामिल है, तो केवल उसकी राजनीतिक विचारधारा या सरकार विरोधी दृष्टिकोण के कारण उसे अपराधी नहीं बनाया जा सकता। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना शासन का कानून लागू करने का अधिकार।
यहीं कानून और राजनीति के बीच वास्तविक सीमा दिखाई देती है। राजनीतिक बहस में आरोप बहुत तेजी से फैल जाते हैं। सामाजिक माध्यमों पर किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करना आसान है। लेकिन न्यायालय में हर आरोप को प्रमाण की कसौटी से गुजरना पड़ता है। इसलिए आंदोलन की आलोचना हो या सरकार की कार्रवाई का समर्थन, दोनों स्थितियों में प्रमाण, प्रक्रिया और कानून को केंद्र में रखना आवश्यक है।
झारखंड का छात्र आंदोलन और राजनीतिक हस्तक्षेप का सवाल | Political Polarization in India
झारखंड के विरोध प्रदर्शन का संदर्भ इस बहस को और गंभीर बनाता है। सवाल यह उठता है कि यदि आंदोलन शिक्षा, परीक्षा, विश्वविद्यालय या रोजगार जैसे किसी स्पष्ट मुद्दे को लेकर खड़ा हुआ है, तो उसके मंच पर दूसरे राजनीतिक मुद्दों को कितनी जगह मिलनी चाहिए।
किसी आंदोलन की शक्ति उसकी मांग की स्पष्टता में होती है। यदि प्रश्न शिक्षा का है, तो शिक्षा केंद्र में रहनी चाहिए। यदि प्रश्न विश्वविद्यालय की नीति का है, तो विश्वविद्यालय की नीति पर चर्चा होनी चाहिए। यदि प्रश्न रोजगार का है, तो बेरोजगारी और अवसरों पर बहस होनी चाहिए। जब हर आंदोलन को व्यापक राजनीतिक संघर्ष का अखाड़ा बना दिया जाता है, तब मूल मुद्दा धीरे-धीरे पीछे छूटने लगता है।
हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसी छात्र आंदोलन में राजनीतिक विचार रखने वाले लोगों की मौजूदगी अपने आप में आंदोलन को गलत नहीं बना देती। लोकतंत्र में विचारों पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। राजनीतिक चेतना और राजनीतिक हस्तक्षेप के बीच अंतर करना जरूरी है।
इसलिए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि आंदोलन में कौन दिखाई दे रहा है। असली सवाल यह होना चाहिए कि आंदोलन की मांग क्या है, उसकी पद्धति क्या है और क्या वह कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रख रहा है।
‘टुकड़े-टुकड़े गिरोह’ की राजनीति और शब्दों का हथियार | Political Polarization in India
भारतीय राजनीति में ‘टुकड़े-टुकड़े गिरोह’ एक अत्यंत प्रभावशाली राजनीतिक शब्द बन चुका है। इस शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को एक खास विचारधारा से जोड़ने के लिए किया जाता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब कोई राजनीतिक शब्द तथ्य और प्रमाण की जगह लेने लगे।
किसी व्यक्ति को राष्ट्रविरोधी कहना आसान है। लेकिन राष्ट्रविरोधी गतिविधि की वास्तविक परिभाषा क्या है? उसका प्रमाण क्या है? उसका कानूनी आधार क्या है? क्या संबंधित आरोप न्यायालय में प्रमाणित हुआ है? इन प्रश्नों से बचकर कोई भी गंभीर लोकतांत्रिक बहस पूरी नहीं हो सकती।
राष्ट्रवाद लोकतंत्र का विरोधी नहीं है। उसी तरह असहमति भी राष्ट्रविरोधी नहीं होती। सरकार की आलोचना करना अपने आप में देशविरोध नहीं है। सत्ता के निर्णयों पर प्रश्न उठाना भी लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, घृणा फैलाना या अलगाववादी हिंसा का समर्थन एक अलग विषय है। इन गंभीर गतिविधियों को केवल असहमति की श्रेणी में रख देना भी उतना ही गलत होगा।
लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि वह असहमति और हिंसा के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखे।
सामाजिक माध्यमों ने आंदोलन की राजनीति बदल दी है | Political Polarization in India
आज आंदोलन केवल सड़क पर नहीं होता। आंदोलन कैमरे के सामने भी होता है। सड़क का दृश्य कैमरे में कैद होता है। फिर वह छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित होकर सामाजिक माध्यमों पर फैलता है। उसके बाद वही दृश्य राजनीतिक धारणा बनाने लगता है।
यहीं से वास्तविक आंदोलन और उसके डिजिटल प्रभाव के बीच अंतर पैदा होता है। सड़क पर कुछ हजार लोग हों, लेकिन उसका दृश्य कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। एक नारा पूरे देश में चर्चा का विषय बन सकता है। एक आरोप बिना प्रमाण के भी बार-बार दोहराया जा सकता है।
यह सामाजिक माध्यमों की ताकत है। लेकिन यही उसका सबसे बड़ा खतरा भी है। सूचना की गति बढ़ी है, लेकिन सत्यापन की आदत उसी गति से नहीं बढ़ी। परिणाम यह है कि राजनीतिक ध्रुवीकरण भी तेजी से फैल रहा है।
नई पीढ़ी इस परिवर्तन की सबसे बड़ी सहभागी है। वह परंपरागत माध्यमों के साथ-साथ वैकल्पिक माध्यमों से भी जानकारी लेती है। लेकिन यही व्यवस्था उसे आधी-अधूरी जानकारी और एकतरफा राजनीतिक सामग्री के प्रभाव में भी ला सकती है। इसलिए राजनीतिक चेतना के साथ तथ्य जांचने की आदत भी उतनी ही जरूरी है।
मीडिया को भी अपनी भूमिका पर विचार करना होगा | Political Polarization in India
राजनीतिक आंदोलनों में पत्रकारों और समाचार माध्यमों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। पत्रकार का काम प्रश्न पूछना है। घटनाओं की जानकारी जनता तक पहुंचाना है। सत्ता से सवाल करना है। विपक्ष से सवाल करना है। आंदोलनकारियों से भी सवाल करना है।
लेकिन पत्रकार और राजनीतिक पक्षकार के बीच की सीमा धुंधली नहीं होनी चाहिए। यदि पत्रकार किसी आंदोलन का हिस्सा बन जाता है, तो उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे। दूसरी तरफ आंदोलनकारियों को भी पत्रकार के प्रश्नों से असहमति रखने का पूरा अधिकार है।
लेकिन असहमति का उत्तर हिंसा नहीं हो सकता। स्याही फेंकना हो, धक्का देना हो या थप्पड़ मारना हो, इनमें से किसी को भी लोकतांत्रिक विरोध की सामान्य पद्धति नहीं बनाया जा सकता। विचार का जवाब विचार से होना चाहिए। कानून का उल्लंघन हो तो उसका उत्तर कानून देगा।
यही वह सीमा है, जिसे राजनीतिक समाज को हर परिस्थिति में बनाए रखना होगा।
स्याही से शुरू होकर हिंसा तक पहुंचने वाली राजनीति | Political Polarization in India
किसी राजनीतिक कार्यकर्ता पर स्याही फेंकने जैसी घटना को लेकर यदि कोई राजनीतिक समर्थन व्यक्त करता है, तो यह केवल एक छोटी घटना का समर्थन नहीं होता। यह राजनीतिक संस्कृति के बारे में एक व्यापक संदेश भी देता है।
किसी व्यक्ति के विचार से असहमति हो सकती है। उसकी राजनीति की आलोचना की जा सकती है। उसके वक्तव्य को गलत बताया जा सकता है। उसके तर्क को कमजोर साबित किया जा सकता है। लेकिन किसी व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना या उस पर हमला करना लोकतांत्रिक आदर्श नहीं है।
यदि स्याही को राजनीतिक विरोध का स्वीकार्य हथियार बना दिया गया, तो आगे थप्पड़ को भी उचित ठहराने की कोशिश होगी। उसके बाद धक्का, पत्थर और लाठी के लिए भी तर्क खोजे जा सकते हैं। लोकतंत्र इसी क्रम में कमजोर होता है।
राष्ट्रवाद की सबसे मजबूत अभिव्यक्ति भीड़ की शक्ति में नहीं, बल्कि कानून के सम्मान में दिखाई देती है।
बुलडोजर की राजनीति और कानून की कसौटी | Political Polarization in India
उत्तर प्रदेश में बुलडोजर अब केवल प्रशासनिक मशीन नहीं रह गया है। वह एक राजनीतिक प्रतीक बन चुका है। समर्थकों के लिए यह अपराध और अवैध कब्जे के खिलाफ कठोर कार्रवाई का प्रतीक है। विरोधियों के लिए यह प्रश्न है कि क्या प्रशासनिक कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया से पहले या उसके समानांतर दंड का रूप ले सकती है।
इस प्रश्न का उत्तर भावनाओं से नहीं मिल सकता। यदि कोई निर्माण अवैध है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि जमीन पर अवैध कब्जा है, तो उसे हटाया जाना चाहिए। लेकिन यही नियम हर व्यक्ति और हर राजनीतिक पहचान पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
कानून की असली ताकत उसकी कठोरता में नहीं, उसकी समानता में है। यदि कानून राजनीतिक पहचान देखकर अलग-अलग व्यवहार करने लगे, तो कानून का शासन कमजोर होगा।
लखनऊ के अकबर नगर जैसे उदाहरण इसी व्यापक बहस को सामने लाते हैं। अवैध निर्माण और अतिक्रमण के विरुद्ध कार्रवाई को सरकार शहरी पुनर्विकास और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ सकती है। दूसरी ओर प्रभावित लोगों की ओर से विस्थापन और मानवीय संकट का प्रश्न उठ सकता है। दोनों पक्षों पर बहस हो सकती है।
लेकिन शहरों में दशकों से बने अवैध निर्माण केवल अंतिम प्रशासनिक कार्रवाई से पैदा नहीं होते। उनके पीछे वर्षों की प्रशासनिक विफलता, स्थानीय भ्रष्टाचार, राजनीतिक संरक्षण और नागरिकों की मजबूरी भी हो सकती है। इसलिए केवल बुलडोजर चलने के दृश्य को देखकर पूरी कहानी समझ लेना पर्याप्त नहीं है।
जनता अब केवल मतदान नहीं करती | Political Polarization in India
भारतीय राजनीति में जनता की भूमिका बदल रही है। पहले चुनाव राजनीतिक प्रतिक्रिया का सबसे बड़ा माध्यम थे। अब स्थिति अलग है। जनता सामाजिक माध्यमों पर प्रतिक्रिया देती है। सड़क पर उतरती है। वीडियो बनाती है। सरकार का समर्थन करती है। विरोध करती है। राजनीतिक दलों की कथाओं को चुनौती देती है।
नई पीढ़ी इस बदलाव की सबसे बड़ी शक्ति है। लेकिन उसे किसी एक राजनीतिक खांचे में रख देना भूल होगी। युवा मतदाता हमेशा किसी एक विचारधारा का स्थायी समर्थक नहीं होता। वह मुद्दों के आधार पर निर्णय ले सकता है।
उसके लिए शिक्षा महत्वपूर्ण हो सकती है। रोजगार महत्वपूर्ण हो सकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा महत्वपूर्ण हो सकती है। महंगाई, भ्रष्टाचार, पहचान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी महत्वपूर्ण हो सकती है। अलग-अलग मुद्दों पर उसकी राय अलग हो सकती है।
यही लोकतंत्र की जटिलता है। जनता को किसी राजनीतिक दल की स्थायी संपत्ति समझना लोकतंत्र की सबसे बड़ी भूलों में से एक है।
राष्ट्रवाद और असहमति को आमने-सामने खड़ा करना गलत है | Political Polarization in India
आज भारतीय राजनीति में एक खतरनाक भ्रम बढ़ रहा है। ऐसा मानने की कोशिश होती है कि राष्ट्रवाद और असहमति एक-दूसरे के विरोधी हैं। जबकि लोकतांत्रिक भारत की मूल संरचना इस विचार को स्वीकार नहीं करती।
संविधान नागरिकों को अधिकार देता है। वही संविधान राज्य को कानून लागू करने की शक्ति देता है। वही संविधान शांतिपूर्ण विरोध की गुंजाइश देता है। और वही संविधान हिंसा तथा कानून के उल्लंघन के विरुद्ध व्यवस्था को शक्ति देता है।
इसलिए राष्ट्रवाद की वास्तविक परीक्षा केवल नारों में नहीं होती। वह संविधान के सम्मान में होती है। यदि कोई राष्ट्रवादी है, तो उसे संविधान का सम्मान करना होगा। यदि कोई सरकार का विरोधी है, तो उसे भी संविधान का सम्मान करना होगा।
यही संतुलन भारत की लोकतांत्रिक शक्ति है।
राजनीतिक भाषा को बदलना क्यों जरूरी है? | Political Polarization in India
राजनीति में कठोर शब्दों का इस्तेमाल नया नहीं है। लेकिन किसी राजनीतिक विरोधी के लिए ‘काकरोच’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल बहस को एक खतरनाक दिशा में ले जाता है। ऐसी भाषा समर्थकों में उत्साह पैदा कर सकती है। लेकिन क्या वह समाज को जोड़ सकती है?
राजनीतिक आलोचना कठोर हो सकती है। सत्ता के निर्णयों की तीखी आलोचना भी हो सकती है। विपक्ष के तर्कों को पूरी ताकत से खारिज किया जा सकता है। लेकिन अमानवीय भाषा धीरे-धीरे राजनीतिक विरोध को सामाजिक दुश्मनी में बदल देती है।
फिर व्यक्ति मुद्दे पर चर्चा नहीं करता। वह व्यक्ति पर हमला करता है। विचार पीछे चला जाता है। पहचान सामने आ जाती है। और लोकतांत्रिक बहस संघर्ष की जगह वैमनस्य का रूप लेने लगती है।
आज भारतीय राजनीति की एक बड़ी समस्या यही है। हम विचारों को नहीं लड़ाते। हम पहचान को लड़ाने लगते हैं।
सड़क और संसद दोनों लोकतंत्र के मंच हैं | Political Polarization in India
जनता सड़क पर भी अपनी आवाज उठा सकती है और संसद में भी अपने प्रतिनिधि भेज सकती है। शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का अधिकार है। चुनाव में सरकार बदलना भी लोकतंत्र का अधिकार है। सांसद चुनना, सरकार बनाना और सरकार को हटाना, ये सभी जनता की राजनीतिक शक्ति के रूप हैं।
लेकिन राजनीतिक ‘इलाज’ का लोकतांत्रिक अर्थ एक ही होना चाहिए। विचारों को राजनीतिक रूप से पराजित करना। किसी व्यक्ति को शारीरिक रूप से पराजित करना नहीं।
यही सभ्य लोकतंत्र और भीड़तंत्र के बीच का अंतर है।
आज की असली लड़ाई केवल किसी एक राजनीतिक दल और दूसरे राजनीतिक दल के बीच नहीं है। यह केवल वाम और दक्षिण के बीच का संघर्ष भी नहीं है। यह राष्ट्रवादी और उदारवादी विचारों की सामान्य बहस से भी आगे की बात है।
असली संघर्ष लोकतांत्रिक राजनीतिक संस्कृति और उग्र राजनीतिक भाषा के बीच है।
एक तरफ वह भारत है, जहां छात्र अपने प्रश्न पूछता है। दूसरी तरफ वह भारत है, जहां छात्र को केवल उसकी राजनीतिक पहचान से परिभाषित किया जाता है। एक तरफ वह राष्ट्रवाद है, जो संविधान को मजबूत करता है। दूसरी तरफ वह उग्रता है, जो असहमति को देशद्रोह समझने लगती है। एक तरफ वह विरोध है, जो सरकार से प्रश्न करता है। दूसरी तरफ वह विरोध है, जो हिंसा को राजनीतिक अधिकार मानने लगता है।
दोनों अतियां लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं।
नई पीढ़ी को किसी एक खांचे में मत बांधिए | Political Polarization in India
नई पीढ़ी को कभी राष्ट्रवादी कहा जाता है। कभी उदारवादी। कभी वामपंथी। कभी दक्षिणपंथी। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।
यह इंटरनेट की पीढ़ी है। यह सवाल करती है। वीडियो देखती है। अलग-अलग स्रोत खोजती है। मुख्यधारा के समाचार माध्यमों पर सवाल उठाती है। सामाजिक माध्यमों के प्रभावशाली चेहरों पर भी सवाल करती है।
लेकिन इसी कारण यह गलत सूचना का शिकार भी हो सकती है। एकतरफा सामग्री उसे किसी भी दिशा में धकेल सकती है। इसलिए नई पीढ़ी को सबसे ज्यादा जरूरत राजनीतिक नारों की नहीं, बल्कि तथ्यों को जांचने की आदत की है।
लोकतंत्र में जागरूक नागरिक वही है, जो अपनी पसंद की बात पर भी प्रश्न कर सके और अपने विरोधी की बात को भी बिना पूर्वाग्रह के सुन सके।
‘काकरोच’ नहीं, नागरिक देखिए | Political Polarization in India
‘काकरोचों का नाश’ जैसी भाषा राजनीतिक भावनाओं को भड़काने के लिए प्रभावशाली हो सकती है। लेकिन लोकतंत्र में हमें अपने राजनीतिक विरोधियों को कीड़े-मकोड़ों की तरह देखने से बचना होगा।
क्योंकि लोकतंत्र में विरोधी भी नागरिक है। उसके विचार गलत हो सकते हैं। उसका तर्क कमजोर हो सकता है। उसकी राजनीति से असहमति हो सकती है। लेकिन वह नागरिक है।
नागरिक को खत्म नहीं किया जाता। उसके विचार को चुनाव में हराया जाता है। उसकी राजनीति को जनता अस्वीकार करती है। उसके अपराध पर कानून कार्रवाई करता है। यही लोकतंत्र का रास्ता है।
उत्तर प्रदेश की कठोर कानून-व्यवस्था हो। झारखंड का छात्र आंदोलन हो। जंतर-मंतर का विवाद हो। समाचार माध्यमों की भूमिका हो। या तथाकथित ‘टुकड़े-टुकड़े गिरोह’ की बहस हो। हर मामले में एक ही कसौटी होनी चाहिए।
प्रमाण। कानून। संविधान। और अंत में जनता का फैसला।
भारत की जनता को किसी राजनीतिक शिविर की स्थायी संपत्ति समझना सबसे बड़ी राजनीतिक भूल होगी। आज जो सड़क पर है, वह कल संसद में हो सकता है। आज जो सत्ता में है, वह कल विपक्ष में हो सकता है। आज जिस विचार को बहुमत मिला है, कल उसी विचार को जनता नकार सकती है।
यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।
इसलिए मुकाबला होना चाहिए। लेकिन विचारों का। तर्क का। नीतियों का। चुनाव का। जनता के विश्वास का। गाली, हिंसा और भीड़ की ताकत का नहीं।
समापन टिप्पणी
भारत को ‘काकरोचों’ की राजनीति नहीं चाहिए। भारत को जागरूक नागरिकों की राजनीति चाहिए। ऐसी राजनीति चाहिए, जिसमें विरोधी को मिटाने के बजाय उसके तर्क को चुनौती दी जाए। ऐसी राजनीति चाहिए, जिसमें सरकार कठोर हो सकती है, लेकिन कानून से ऊपर नहीं। ऐसी राजनीति चाहिए, जिसमें आंदोलन मुखर हो सकता है, लेकिन हिंसक नहीं। ऐसी राजनीति चाहिए, जिसमें राष्ट्रवाद मजबूत हो, लेकिन संविधान की कीमत पर नहीं।
और शायद यही इस पूरे विवाद से निकलने वाला सबसे बड़ा सबक है।
राष्ट्र सबसे ऊपर है।
लेकिन राष्ट्र का अर्थ केवल नारा नहीं है।
राष्ट्र का अर्थ संविधान है। कानून है। न्याय है। असहमति का सम्मान है। नागरिक की गरिमा है। और अंततः जनता की सर्वोच्चता है।
यही वह सीमा है, जिसे राजनीति को कभी पार नहीं करना चाहिए।






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