Reservation Debate | आरक्षण का अपमान सम्मेलन: जब हर कोई खुद को सम्राट साबित करने पर तुला हो
भारत बड़ा अद्भुत देश है। अद्भुत ही नहीं ‘चंपकों का देश’ है। अजी मैं तो कहता हूँ कि ये देश है ही नहीं, बल्कि भठियारखाना है। बोले तो, ‘भठियारों का देश’ है। यहाँ हर दूसरे दिन कोई न कोई अपने पूर्वजों की ऐसी वंशावली लेकर प्रकट हो जाता है कि इतिहास विभाग भी माथा पकड़कर बैठ जाए। कोई खुद को सूर्यवंशी बताता है, कोई चंद्रवंशी, कोई सीधे सम्राट अशोक का वंशज निकल आता है, तो कोई विज्ञान की ऐसी विलुप्त “वैज्ञानिक प्रजाति” का सदस्य घोषित हो जाता है, जिसकी खोज अभी तक नासा भी नहीं कर पाया।
सोशल मीडिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय यही सिखाता है कि अगर आपके पास कोई ठोस तर्क नहीं है, तो अपने पूर्वजों को महान घोषित कर दीजिए। उसके बाद विरोधी को मूर्ख, अज्ञानी, बिकाऊ और राष्ट्रविरोधी बता दीजिए। बहस अपने आप जीत जाएंगे।
Reservation Debate
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आजकल एक नई शैली चल पड़ी है। पहले किसी समुदाय के लिए दर्जनों विशेषण लिखिए- “वीर”, “शूरवीर”, “महान”, “वैज्ञानिक”, “बुद्धिमान”, “सम्राटों की संतान”-और फिर अंत में निष्कर्ष निकालिए कि अगर ये इतने महान हैं तो इन्हें आरक्षण क्यों? सवाल सुनने में बड़ा मासूम लगता है, लेकिन इसका तरीका अक्सर ऐसा होता है कि प्रश्न कम और व्यंग्यात्मक अपमान अधिक बन जाता है। यही वह जगह है जहाँ संवाद खत्म होता है और शोर शुरू हो जाता है। दरअसल, हमारे यहाँ इतिहास का उपयोग इतिहास समझने के लिए कम और वर्तमान की राजनीति को हथियार देने के लिए अधिक किया जाता है। हर पक्ष अपने पसंदीदा अध्याय पढ़ता है और बाकी पन्ने फाड़ देता है।
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एक मज़ेदार दृश्य की कल्पना कीजिए। मान लीजिए सरकार घोषणा कर दे कि अब किसी को जाति प्रमाणपत्र नहीं मिलेगा। उसकी जगह सभी को “महान सम्राट प्रमाणपत्र” मिलेगा।
सुबह-सुबह तहसील के बाहर लाइन लगी है।
पहला व्यक्ति कहता है-“मुझे सम्राट अशोक का वंशज प्रमाणपत्र चाहिए।”
दूसरा कहता है- “मैं तो उससे भी बड़ा हूँ, मुझे चंद्रगुप्त संस्करण दीजिए।”
तीसरा बोल पड़ता है- “भाई साहब, मेरे पूर्वजों ने तो पूरी पृथ्वी नाप रखी थी, मुझे इंटरनेशनल सम्राट वाला बना दीजिए।”
क्लर्क बेचारा पूछे- “साबित कैसे करेंगे?”
उत्तर मिलेगा- “फेसबुक पोस्ट है मेरे पास।”
इतिहासकार बेहोश। लेकिन सोशल मीडिया पर लाइक्स बरसने लगेंगे।
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आज की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि हम इतिहास को प्रमाण नहीं, प्रचार सामग्री समझने लगे हैं। विडंबना देखिए- जब कोई अपने समुदाय की उपलब्धियों का सम्मान करता है, तब तक बात ठीक है। लेकिन जैसे ही वह दूसरे समुदाय को नीचा दिखाकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने लगता है, वहाँ से सम्मान समाप्त होकर अहंकार शुरू हो जाता है। फिर बहस आरक्षण पर नहीं रहती। बहस “तुम बनाम हम” पर आ जाती है। सोशल मीडिया पर ऐसे योद्धाओं की कमी नहीं है जो सुबह चाय पीते-पीते पाँच जातियों को समाप्त घोषित कर देते हैं, दोपहर तक इतिहास बदल देते हैं और शाम तक संविधान की समीक्षा भी कर डालते हैं। उनकी सबसे बड़ी योग्यता यह होती है कि उन्होंने कोई किताब नहीं पढ़ी होती। लेकिन आत्मविश्वास ऐसा कि संविधान सभा में अगर होते तो डॉ. भीमराव आंबेडकर से भी कहते—”सर, एक मिनट… मेरी भी सुन लीजिए।” यहीं समस्या शुरू होती है।
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भारत का संविधान किसी व्यक्ति के अहंकार का दस्तावेज़ नहीं है। यह उन ऐतिहासिक परिस्थितियों की प्रतिक्रिया है जिन्हें समझे बिना केवल भावनाओं के आधार पर निष्कर्ष निकालना आसान तो है, पर पर्याप्त नहीं। आरक्षण पर चर्चा हो सकती है। उसकी समीक्षा पर चर्चा हो सकती है। उसके स्वरूप, प्रभाव, आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक आयामों पर गंभीर बहस हो सकती है। लेकिन बहस तथ्यों पर होनी चाहिए, तानों पर नहीं। इस व्यंग्य का उद्देश्य भी व्यक्ति या समुदाय का अपमान नहीं, बल्कि सोच की विसंगतियों को उजागर करना होता है। आज सोशल मीडिया पर हर कोई न्यायाधीश है। हर कोई इतिहासकार है। हर कोई अर्थशास्त्री है। हर कोई संवैधानिक विशेषज्ञ है। और सबसे बड़ी बात… हर कोई दूसरे को मूर्ख समझता है। यही हमारी डिजिटल सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
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किसी पोस्ट में लिखा मिलता है कि फलाँ समुदाय सबसे महान है। दूसरी पोस्ट कहती है कि नहीं, सबसे महान तो हमारा समुदाय है। तीसरी पोस्ट बताती है कि दोनों गलत हैं। चौथी पोस्ट में सभी देशद्रोही घोषित हो चुके होते हैं। और पाँचवीं पोस्ट तक पहुँचते-पहुँचते एल्गोरिद्म खुश हो जाता है, क्योंकि जितना अधिक झगड़ा, उतना अधिक एंगेजमेंट।
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सोशल मीडिया को सत्य से उतना प्रेम नहीं जितना विवाद से है। वह आपको वही दिखाता है जिससे आप अधिक देर तक स्क्रीन पर टिके रहें। इसलिए कटाक्ष, तंज और उकसावे वाली भाषा तेजी से फैलती है। इस पूरे शोर में सबसे अधिक नुकसान किसका होता है? उन लोगों का, जो सचमुच संवाद करना चाहते हैं। वे धीरे-धीरे चुप हो जाते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि यहाँ तथ्य नहीं, ट्रोलिंग जीतती है। यह भी सच है कि भारत के इतिहास में अनेक महापुरुष हुए हैं। सम्राट अशोक का योगदान अमूल्य है। डॉ. भीमराव आंबेडकर का योगदान अतुलनीय है। आदि शंकराचार्य, चाणक्य, स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, कबीर, तुलसीदास, गुरु नानक, महात्मा गांधी, सरदार पटेल, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और असंख्य अन्य व्यक्तित्वों ने अपने-अपने क्षेत्र में भारत को समृद्ध बनाया।
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महापुरुष किसी जाति की निजी संपत्ति नहीं होते। वे पूरे समाज की धरोहर होते हैं। यदि हम हर महापुरुष को जातियों की दीवारों में बाँट देंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास नहीं, केवल विवाद पढ़ेंगी। व्यंग्य का सबसे बड़ा पात्र शायद हम स्वयं हैं। हम अपने वर्तमान को सुधारने के बजाय अपने पूर्वजों की उपलब्धियों पर बहस करते रहते हैं। पूर्वज महान थे या नहीं, यह इतिहास बताएगा। लेकिन हम महान बन पाए या नहीं, इसका उत्तर भविष्य देगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि सार्वजनिक विमर्श में असहमति रहे, पर सम्मान भी बना रहे। आरक्षण जैसे विषयों पर मतभेद स्वाभाविक हैं। लोकतंत्र में नीति, कानून और संवैधानिक व्यवस्थाओं पर चर्चा होना स्वस्थ परंपरा है। लेकिन किसी भी समुदाय, जाति या महापुरुष का अपमान करके न तो समाज आगे बढ़ता है और न ही तर्क मजबूत होते हैं।
और अंत में,
अगर हर समुदाय स्वयं को सबसे वीर, सबसे बुद्धिमान, सबसे वैज्ञानिक, सबसे महान और सबसे श्रेष्ठ मानता है… तो फिर सोशल मीडिया पर रोज़-रोज़ यह साबित करने की ज़रूरत क्यों पड़ती है? शायद इसलिए कि आत्मविश्वास को प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं होती, लेकिन असुरक्षा को हमेशा दर्शकों की तलाश रहती है। और सोशल मीडिया… वह दर्शक भी देता है, ताली भी बजाता है और अगली लड़ाई का मंच भी तैयार रखता है।




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