Respect Logic | सम्मान की क्लास में मंत्री जी का अनोखा लॉजिक
भारत एक ऐसा देश है जहां ज्ञान की गंगा हर गली, मोहल्ले और चाय की दुकान से निकलती है। यहां कोई भी व्यक्ति किसी भी विषय पर विशेषज्ञता का ऐसा प्रदर्शन कर सकता है कि बड़े-बड़े विश्वविद्यालय भी अपनी डिग्रियां छुपाने लगें। मगर कभी-कभी राजनीति की प्रयोगशाला से ऐसे अनोखे तर्क निकलकर आते हैं कि विज्ञान, गणित और सामान्य बुद्धि तीनों एक साथ छुट्टी पर चले जाते हैं।
हाल ही में ऐसा ही एक ज्ञान का विस्फोट देखने को मिला, जब बिहार सरकार के मंत्री दिलीप जायसवाल जी ने पत्रकार के सवाल पर ऐसा तर्क प्रस्तुत किया कि देश के संबोधन तंत्र की पूरी व्यवस्था ही खतरे में पड़ गई। मामला था लोकप्रिय शिक्षक खान सर को “सर” कहने का।
मंत्री जी ने बड़े आत्मविश्वास से पत्रकार से सवाल कर दिया कि- आप उनसे पढ़ते हैं? नहीं पढ़ते हैं? फिर वो आपके सर कैसे हुए? खान जी बोलिए ना। अगर आप विद्यार्थी नहीं हैं तो खान सर मत बोलिए, खान जी बोलिए।
Respect Logic
वाह मंत्री जी! क्या शानदार खोज है। ऐसा लगता है कि संबोधन की नई शिक्षा नीति तैयार हो चुकी है। अब किसी को सम्मान देने से पहले हमें अपनी पूरी शैक्षणिक स्थिति साबित करनी होगी। यानी अब “सर” बोलने के लिए प्रवेश पत्र दिखाना पड़ेगा, फीस की रसीद जमा करनी पड़ेगी और यह प्रमाण देना होगा कि हमने जीवन में उस व्यक्ति से कम से कम एक अध्याय तो पढ़ा है। मंत्री जी के इस नए Respect Logic के अनुसार अब देश में रिश्ते और सम्मान दोनों का नया नियम लागू होना चाहिए।
मान लीजिए आप अस्पताल जाते हैं। वहां डॉक्टर साहब आपके पिता जी का इलाज कर रहे हैं। पुराने जमाने के लोग तो आदर से बोल देते थे- डॉक्टर साहब। लेकिन मंत्री जी के नए नियम के अनुसार आप तुरंत रुक जाइए।
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क्योंकि डॉक्टर साहब आपके पिता जी को देख रहे हैं, आपको नहीं। इसलिए आप उन्हें डॉक्टर साहब कैसे बोल सकते हैं? सीधे क्लिनिक में जाइए और कहिए- नमस्कार रमेश जी, हमारे पिताजी का ब्लड प्रेशर कैसा चल रहा है? डॉक्टर भी सोचेंगे कि मेडिकल की डिग्री तो ली थी, लेकिन संबोधन की डिग्री लेना भूल गए।
अब पुलिस व्यवस्था का क्या होगा, यह तो सोचकर ही हंसी आती है। सड़क पर पुलिस अधिकारी आपकी गाड़ी रोकते हैं। आम जनता आदर से कहती है- इंस्पेक्टर साहब। लेकिन मंत्री जी के नियम के अनुसार यह भी गलत है। क्योंकि वह इंस्पेक्टर साहब आपके घर की चोरी नहीं सुलझा रहे, आपकी व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए नियुक्त नहीं हैं, तो आप उन्हें साहब कैसे बोल सकते हैं?
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अब नया तरीका अपनाइए।
“अरे सुरेश जी, जरा लाइसेंस देख लीजिए। ज्यादा भाव मत खाइए, अभी मेरा कोई केस नहीं संभाल रहे हैं।”
वाह! क्या लोकतांत्रिक क्रांति होगी। पुलिस और जनता के बीच सम्मान का रिश्ता खत्म, सिर्फ नाम से बातचीत शुरू। अब न्यायपालिका की बारी आती है। कोर्ट में लोग वर्षों से जज साहब को सम्मान देते आए हैं। लेकिन मंत्री जी के सिद्धांत के बाद तो यह भी जांच का विषय बन जाएगा। जब तक जज साहब आपका व्यक्तिगत मुकदमा नहीं सुन रहे, तब तक आप उन्हें जज साहब कैसे कहेंगे?
कटघरे में खड़े होकर बोलिए- “वर्मा जी, अगली तारीख कब रख रहे हो?”
जज साहब भी सोचेंगे कि संविधान पढ़ लिया, कानून समझ लिया, लेकिन संबोधन का नया कानून तो आज पता चला। सबसे बड़ा बदलाव तो स्कूलों में होगा।
Respect Logic
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अब तक बच्चे अपने शिक्षक को सर कहते थे। माता-पिता भी आदर से शिक्षक को सर कहते थे। लेकिन मंत्री जी के नियम से माता-पिता को सावधान रहना होगा। क्योंकि माता-पिता तो शिक्षक से नहीं पढ़ते।
पीटीएम में पिता जी जाएंगे और बोलेंगे- “शर्मा जी, जरा हमारे बच्चे का रिजल्ट दिखाइए।”
प्रधानाचार्य भी सोचेंगे कि शिक्षा व्यवस्था में नई किताब आ गई है- “सम्मान बोलने से पहले संबंध प्रमाणित करें।”
मगर असली मजा तब आएगा जब यही नियम राजनीति पर लागू होगा। अगर किसी व्यक्ति का कभी मंत्री जी के विभाग से कोई काम नहीं पड़ा, तो वह मंत्री जी को मंत्री जी क्यों बोले? क्योंकि मंत्री जी ने उसका व्यक्तिगत काम थोड़ी किया है।
अब जनता भी कार्यालय में जाकर कह सकती है- “दिलीप जी, जरा बैठिए, आपसे कुछ काम था।”
Respect Logic
फिर शायद राजनीति को भी एहसास होगा कि सम्मान पद से नहीं, व्यवहार और योगदान से मिलता है। समस्या यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को सर क्यों कहा गया। समस्या यह है कि हम कभी-कभी इतने बड़े पदों पर बैठे लोगों से ऐसे तर्क सुन लेते हैं जिन्हें सुनकर स्कूल की पहली कक्षा का बच्चा भी अपना सिर पकड़ ले। “सर” कोई निजी ट्यूशन का कार्ड नहीं है। यह भारतीय समाज की वह परंपरा है जिसमें हम ज्ञान, अनुभव और सम्मान के प्रति आदर व्यक्त करते हैं।
एक शिक्षक सिर्फ उन बच्चों का शिक्षक नहीं होता जो उसकी कक्षा में बैठे हैं। समाज में जो व्यक्ति हजारों-लाखों लोगों को शिक्षा देता है, उन्हें दिशा देता है, उनके सपने पूरे करने में मदद करता है, उसके लिए सम्मान का शब्द किसी पहचान पत्र का मोहताज नहीं होता।
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खान सर हों, कोई अन्य शिक्षक हों या गांव की छोटी सी पाठशाला में बच्चों को पढ़ाने वाला गुरु- उनका सम्मान इसलिए नहीं होता कि हर व्यक्ति उनका विद्यार्थी है, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि उनका काम समाज को आगे बढ़ाता है। शायद यही फर्क है किताब पढ़ने और किताब समझने में। कई बार कुर्सी बड़ी हो जाती है और सोच छोटी रह जाती है। तब ऐसे तर्क जन्म लेते हैं जहां सम्मान को भी प्रमाणपत्र की जरूरत पड़ने लगती है।
Respect Logic
मंत्री जी का यह तर्क अगर देशभर में लागू हो गया तो सबसे पहले शब्दकोश को नौकरी से निकालना पड़ेगा। क्योंकि “सर”, “साहब” और “गुरु” जैसे शब्द अब रिश्ते नहीं, बल्कि सरकारी अनुमति से इस्तेमाल होने वाले शब्द बन जाएंगे। फिलहाल जनता को उम्मीद है कि सम्मान की यह क्लास जल्द खत्म होगी और ज्ञान की असली क्लास फिर शुरू होगी। क्योंकि किसी को सर कहने के लिए उसका विद्यार्थी होना जरूरी नहीं, बस सामने वाले के योगदान को पहचानने वाली नजर और सम्मान करने वाला दिल होना जरूरी है।
और अंत में,
बाकी अगर यही नया नियम है तो अगली बार चाय वाले को भी “भैया” बोलने से पहले जांच करनी पड़ेगी कि उसने हमें बचपन में चाय बनाना सिखाया था या नहीं। यही है हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य- जहां असली सवालों से ज्यादा जरूरी हो गया है कि किसे क्या कहकर बुलाया जाए।





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