Revolutionary Influencer | लाल किताब हाथ में, विचार किराए पर!

Revolutionary Influencer | सोशल मीडिया के दौर में क्रांति भी फिल्टर आधारित हो गई है। Revolutionary Influencer बनने की होड़ में विचार गायब हैं और प्रदर्शन बचा है। पढ़िए नल्लों की क्रांति पर तीखा व्यंग्य।


Revolutionary Influencer | फिल्टर वाली क्रांति और नल्लों का महाआंदोलन

भारत एक महान देश है। यहाँ हर युग में क्रांतिकारी पैदा हुए हैं। कभी वे जेल गए, कभी फाँसी पर चढ़े, कभी निर्वासन झेला और कभी भूखे पेट समाज बदलने का सपना देखा। लेकिन आधुनिक भारत ने क्रांति के क्षेत्र में एक नया आविष्कार किया है—”फिल्टर क्रांतिकारी”।

ये वह प्रजाति है जो सुबह उठकर दाँत ब्रश करने से पहले सत्ता बदलने की घोषणा कर देती है और रात में रील पोस्ट करके लोकतंत्र बचा लेती है। इनके अनुसार देश की हर समस्या का समाधान एक हैशटैग, दो स्टोरी और तीन एंग्री इमोजी में समाहित है।

सबसे दुखद बात यह नहीं है कि ऐसे लोग मौजूद हैं। सबसे दुखद बात यह है कि समाज ने नल्लों को क्रांतिकारी मानने की परिपाटी विकसित कर ली है।

क्रांति विचारवान लोग लाते हैं। क्रांति वे लोग लाते हैं जिनके पास दृष्टि होती है। जिनके पास किसी व्यवस्था के विरोध के साथ-साथ उसके विकल्प का भी खाका होता है। लेकिन आजकल क्रांति उन लोगों के हाथ में है जिनकी वैचारिक सीमा ट्रेंडिंग सेक्शन के आखिरी कीवर्ड तक जाकर समाप्त हो जाती है।

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आज का औसत Revolutionary Influencer किसी विषय पर उतना ही जानता है जितना किसी शादी में पहुँचा दूर का रिश्तेदार दूल्हे के बारे में जानता है। उसे बस इतना पता होता है कि नाराज होना है। क्यों होना है, कितने समय तक होना है और नाराजगी के बाद करना क्या है—यह प्रश्न उसकी वैचारिक योग्यता के बाहर है।

आपने ध्यान दिया होगा कि आजकल क्रांति का पहला चरण विचार नहीं, बल्कि लुक होता है।

चेहरा गंभीर होना चाहिए।

बाल बिखरे होने चाहिए।

टीशर्ट पसीने से भीगी होनी चाहिए।

आँखों में ऐसा भाव होना चाहिए मानो अभी-अभी संविधान की रक्षा करते हुए तीन साम्राज्य ध्वस्त कर दिए हों।

और हाथ में एक लाल किताब होनी चाहिए।

किताब पढ़ी हो या न हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आजकल किताब पढ़ने से ज्यादा महत्वपूर्ण है किताब पकड़ना।

लाल किताब आधुनिक राजनीति का वही प्रॉप बन चुकी है जो फिल्मों में नकली स्टेथोस्कोप डॉक्टर के लिए होता है। दर्शक को बस दिखना चाहिए कि व्यक्ति बौद्धिक है। भीतर क्या है, यह जानने की जहमत कौन उठाए?

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फिर कैमरा चालू होता है।

रील रिकॉर्ड होती है।

संगीत बजता है।

और हमारे महानायक पुलिस वाले के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं।

इसके बाद कैप्शन लिखा जाता है—

“देखिए युवा कितना विनम्र है।”

“देखिए सत्ता कितनी क्रूर है।”

“देखिए लोकतंत्र खतरे में है।”

वीडियो समाप्त।

क्रांति सम्पन्न।

अब कमेंट सेक्शन में लोकतंत्र बचाया जाएगा।

दिलचस्प बात यह है कि इन स्वघोषित गाँधियों का पूरा सत्याग्रह आधे घंटे की धूप में वाष्पित हो जाता है। डांडी मार्च के दौरान महात्मा गाँधी सैकड़ों किलोमीटर चले थे। आधुनिक Revolutionary Influencer मेट्रो स्टेशन से प्रदर्शन स्थल तक पैदल चलने पर व्यवस्था परिवर्तन स्थगित कर देता है।

विरोध करना लोकतंत्र का आवश्यक तत्व है।

लेकिन विरोध और अभिनय में अंतर होता है।

आजकल विरोध कम और कास्टिंग ज्यादा दिखाई देती है।

किसी आंदोलन में जाइए।

आप पाएँगे कि कुछ लोग नारे लगा रहे हैं।

कुछ लोग सेल्फी ले रहे हैं।

कुछ लोग लाइव आ रहे हैं।

और कुछ लोग ऐसे भाव बना रहे हैं मानो इतिहास उनकी प्रोफाइल फोटो के लिए ही लिखा जा रहा हो।

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इनमें से अधिकांश को उस मुद्दे का आधा ज्ञान भी नहीं होता जिसके लिए वे धरना दे रहे हैं।

इनसे पूछिए—

“मान लीजिए आपकी माँग मान ली गई, फिर आगे क्या होगा?”

उत्तर में ऐसा मौन प्राप्त होगा जैसा परीक्षा हॉल में नकल की पर्ची पकड़े जाने के बाद छात्र के चेहरे पर दिखाई देता है।

इनकी राजनीति “इस्तीफा दो” पर समाप्त हो जाती है।

इस्तीफा मिल गया तो?

फिर क्या?

कौन आएगा?

किस नीति पर काम करेगा?

वैकल्पिक मॉडल क्या होगा?

अर्थव्यवस्था पर प्रभाव क्या होगा?

संवैधानिक प्रक्रिया क्या होगी?

इन प्रश्नों से इनका उतना ही संबंध है जितना जिम की मेंबरशिप का वास्तविक व्यायाम से।

असल समस्या यही है।

समाज ने विचार को त्यागकर विजुअल को स्वीकार कर लिया है।

अब कोई व्यक्ति जितना कम पढ़ता है, उतना ज्यादा बोलता है।

जितना ज्यादा बोलता है, उतना ज्यादा वायरल होता है।

और जितना ज्यादा वायरल होता है, उतना बड़ा बुद्धिजीवी घोषित कर दिया जाता है।

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यह ऐसा दौर है जिसमें ज्ञान की जगह एल्गोरिद्म ने ले ली है।

प्रतिभा की जगह ट्रेंड ने।

और अध्ययन की जगह एस्थेटिक ने।

आजकल क्रांतिकारी होने का सबसे आसान तरीका है—एक लोकप्रिय दुश्मन चुन लीजिए।

उसके खिलाफ पाँच वीडियो बनाइए।

तीन बार “फासीवाद”, चार बार “संविधान”, दो बार “जनता” और एक बार “क्रांति” बोल दीजिए।

आपका वैचारिक प्रमोशन तत्काल प्रभाव से हो जाएगा।

किसी ने सही कहा है कि मूर्खता जब सामूहिक हो जाती है तो उसे आंदोलन समझ लिया जाता है।

आज का सबसे बड़ा संकट सत्ता नहीं है।

विपक्ष भी नहीं है।

सबसे बड़ा संकट बौद्धिक आलस्य है।

लोग पढ़ना नहीं चाहते।

समझना नहीं चाहते।

सोचना नहीं चाहते।

वे बस किसी ऐसे चेहरे की तलाश में हैं जो उनकी ओर से नाराज हो जाए।

और सोशल मीडिया ने ऐसे चेहरों की फैक्ट्री खोल रखी है।

यह व्यंग्य विरोध के खिलाफ नहीं है।

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यह उन लोगों के खिलाफ है जो विरोध को भी कंटेंट बना चुके हैं।

जो क्रांति को करियर विकल्प समझते हैं।

जो संघर्ष को फोटोग्राफी प्रोजेक्ट में बदल देते हैं।

जो इतिहास में दर्ज होने से पहले इंस्टाग्राम पर ट्रेंड करना चाहते हैं।

और अंत में,

क्रांति कभी फिल्टर से नहीं आती।

क्रांति विचार से आती है।

क्रांति किताब पकड़ने से नहीं, किताब पढ़ने से आती है।

क्रांति नारे लगाने से नहीं, नारे के बाद की योजना से आती है।

और सबसे महत्वपूर्ण बात—

क्रांति उन लोगों से नहीं आती जो हर सप्ताह नया डीपी फ्रेम लगाकर व्यवस्था बदलने निकल पड़ते हैं।

क्रांति हमेशा उन लोगों से आती है जो कैमरे के सामने कम और विचारों के भीतर ज्यादा दिखाई देते हैं।

बाकी जो लोग हर तीसरे दिन देश बचाने निकलते हैं और चौथे दिन किसी ब्रांड के साथ कोलैबरेशन करते मिल जाते हैं, उन्हें इतिहास नहीं, एल्गोरिद्म याद रखता है।

और एल्गोरिद्म की स्मृति, लोकतंत्र में वायरल होने वाले वादों की तरह, बहुत छोटी होती है।

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देश बदल रहा है, व्यवस्था सुधर रही है, नेता सच बोल रहे हैं और सोशल मीडिया पर लोग शालीन हो चुके हैं। अगर आपको भी ऐसा लगता है, तो शायद आपको मेरे व्यंग्य पढ़ने की ज़रूरत है। मैं उन बातों पर लिखता हूँ जिन्हें देखकर आम आदमी सिर पकड़ लेता है और व्यवस्था प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला लेती है। मेरा उद्देश्य किसी को खुश या नाराज़ करना नहीं, बल्कि सच को हँसी के लिबास में पेश करना है। यह पेज उन लोगों के लिए है जो खबरों के बीच छिपे व्यंग्य को समझते हैं और हँसते-हँसते गंभीर बातें सोचने का साहस रखते हैं।"जहाँ तर्क थक जाता है, वहाँ व्यंग्य अपनी बात कहता है।"

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