Yoga Politics | जब शीर्षासन राजनीति से हार गया
भारत महान है। यहां इतिहास को याद करने का भी अपना राजनीतिक मौसम होता है। जैसे आम का मौसम, लीची का मौसम और चुनाव का मौसम होता है, वैसे ही यहां नेहरू स्मरण मौसम भी आता है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस आते ही अचानक कांग्रेस को पंडित जवाहरलाल नेहरू का शीर्षासन याद आ जाता है। तस्वीरें निकलती हैं, ट्वीट होते हैं, और बताया जाता है कि देखिए, योग पर किसी एक दल का पेटेंट नहीं है।
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बात सही है। योग न भाजपा का है, न कांग्रेस का, न वामपंथ का और न दक्षिणपंथ का। योग तो हजारों वर्षों से भारतीय सभ्यता की धरोहर है। लेकिन राजनीति का दुर्भाग्य यह है कि यहां योग भी वोट मांगने लगता है और शीर्षासन भी विचारधारा के आधार पर खड़ा या उल्टा खड़ा घोषित कर दिया जाता है।
इस बार भी नेहरू जी का शीर्षासन खूब चर्चा में रहा। कांग्रेसियों ने ऐसे प्रस्तुत किया जैसे योग का पहला आसन इलाहाबाद के आनंद भवन में ही खोजा गया था। सोशल मीडिया पर तस्वीरें घूमने लगीं। संदेश दिया गया कि योग पर किसी और का नहीं, हमारा भी अधिकार है।
लेकिन इस पूरे उत्सव में एक छोटी-सी भूल हो गई।
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नेहरू जी की बेटी इंदिरा गांधी का नाम जैसे किसी ने जानबूझकर भूल जाने का संकल्प ले लिया। जबकि इतिहास बताता है कि इंदिरा गांधी भी योग करती थीं और उन्हें योग सिखाने वाले कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। उनका नाम था धीरेंद्र ब्रह्मचारी।
अब धीरेंद्र ब्रह्मचारी का नाम लेते ही भारतीय राजनीति का एक अनोखा अध्याय खुलता है। ऐसा अध्याय जिसमें योगासन और सत्ता के गलियारे एक-दूसरे के इतने करीब आ गए थे कि कभी-कभी समझना मुश्किल हो जाता था कि प्राणायाम चल रहा है या राजनीतिक नियुक्तियों का अभ्यास।
कहते हैं कि धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने पहले नेहरू को योग सिखाया। फिर धीरे-धीरे बड़े-बड़े नेता उनके अनुयायी बनते गए। योग का प्रभाव ऐसा था कि उस समय का राजनीतिक वर्ग सांस अंदर लेने और बाहर छोड़ने की कला में विशेष रुचि लेने लगा। हालांकि बाद में राजनीति ने साबित कर दिया कि सांस रोकने और दूसरों की सांस फुलाने की कला में वह पहले से ही निपुण था।
धीरेंद्र ब्रह्मचारी का प्रभाव दिनोंदिन बढ़ता गया। इंदिरा गांधी के साथ उनकी निकटता ऐसी चर्चाओं का विषय बनी कि उन्हें भारत का रासपुतिन तक कहा जाने लगा। अब भारत में किसी व्यक्ति को जितनी जल्दी संत से विवादित बनाया जा सकता है, उतनी जल्दी शायद कहीं और नहीं बनाया जा सकता।
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उन दिनों दूरदर्शन पर धीरेंद्र ब्रह्मचारी का योग कार्यक्रम आता था। सुबह-सुबह पूरा देश टीवी के सामने बैठ जाता था। आज के बच्चे शायद विश्वास न करें कि एक समय ऐसा भी था जब देश के लोग रील देखने के बजाय योगासन देखते थे।
धीरेंद्र ब्रह्मचारी का जलवा ऐसा था कि यदि आज के समय में उनकी तुलना करनी हो तो कई बड़े उद्योगपतियों और प्रभावशाली लोगों को जोड़ना पड़ेगा। सरकारी बंगला, विमान, सत्ता में सीधी पहुंच—सब कुछ मौजूद था।
आज जब लोग बाबा रामदेव को देखकर सोचते हैं कि योग से कितना आगे बढ़ा जा सकता है, तब इतिहास मुस्कुराकर कहता है कि बेटा, धीरेंद्र ब्रह्मचारी का अध्याय अभी पढ़ा ही कहां है।
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उनके पास अपना विमान था। सत्ता के गलियारों में उनकी पकड़ ऐसी बताई जाती थी कि मंत्री तक असहज हो जाते थे। योग के माध्यम से शरीर का संतुलन तो बनाया ही जाता था, कई बार राजनीतिक संतुलन भी बनता-बिगड़ता दिखाई देता था।
विडंबना देखिए कि जिन धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने हजारों लोगों को लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन के मंत्र बताए, उनका अंत भी एक विमान दुर्घटना में हुआ। इतिहास कभी-कभी इतना व्यंग्यपूर्ण हो जाता है कि व्यंग्यकार बेरोजगार होने लगता है।
लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।
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समय बदला। कांग्रेस बदली। नेतृत्व बदला। प्राथमिकताएं बदलीं। योग धीरे-धीरे राजनीतिक विमर्श से गायब होने लगा। फिर एक दिन नरेंद्र मोदी आए और उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को वैश्विक आयोजन बना दिया।
अब समस्या शुरू हुई।
जिस योग पर कभी नेहरू शीर्षासन करते थे, जिस योग को इंदिरा गांधी सीखती थीं, जिस योग को धीरेंद्र ब्रह्मचारी दूरदर्शन पर सिखाते थे, वही योग अचानक कुछ लोगों को राजनीतिक षड्यंत्र लगने लगा।
भारत में विरोध की भी एक अद्भुत परंपरा है। यदि प्रतिद्वंद्वी कहे कि सूरज पूरब से निकलता है तो विरोधी पहले जांच करेगा कि कहीं पश्चिम से निकलने की संभावना तो नहीं है।
मोदी ने योग दिवस शुरू किया, तो योग पर भी बहस शुरू हो गई। जैसे योगासन नहीं, कोई चुनावी घोषणा पत्र हो।
आज स्थिति यह है कि कुछ लोग योग को देखकर शरीर नहीं, सरकार देखने लगते हैं। पद्मासन में प्रधानमंत्री दिखाई देते हैं, अनुलोम-विलोम में वैचारिक संघर्ष और सूर्य नमस्कार में राजनीतिक एजेंडा।
यह वही देश है जहां कभी कांग्रेस गर्व से बताती थी कि नेहरू योग करते थे। आज वही कांग्रेस योग दिवस पर असहज दिखाई देती है। इतिहास सिर पकड़कर बैठा होगा कि आखिर यह परिवर्तन किस आसन के माध्यम से आया।
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राजनीति की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि वह हर चीज को अपने चश्मे से देखने लगती है। योग स्वास्थ्य का विषय है, लेकिन उसे भी राजनीतिक अखाड़ा बना दिया गया।
अब तो हाल यह है कि यदि एलन मस्क किसी दिन कह दें कि उन्हें भारतीय योग पसंद है, तो कुछ लोग यह निष्कर्ष निकाल लेंगे कि मस्क भी किसी राजनीतिक परियोजना का हिस्सा हो गए हैं।
भारत में कल्पना शक्ति का स्तर इतना ऊंचा है कि यहां लोग मान सकते हैं कि दुनिया का सबसे अमीर आदमी भी किसी राजनीतिक नेता द्वारा “खरीद” लिया गया है। जबकि वास्तविकता यह है कि ट्विटर पर एक पोस्ट देखकर बेहोश हो जाने की कला अभी तक योग के किसी ग्रंथ में शामिल नहीं की गई है।
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योग का मूल संदेश संतुलन है। लेकिन हमारी राजनीति का मूल संदेश असंतुलन बन चुका है। योग कहता है मन शांत रखो, राजनीति कहती है ट्रेंडिंग हैशटैग खोजो। योग कहता है भीतर झांको, राजनीति कहती है विरोधी के भीतर झांको।
नेहरू शीर्षासन करते थे। इंदिरा गांधी योग करती थीं। धीरेंद्र ब्रह्मचारी सत्ता के केंद्र तक पहुंचे। मोदी ने योग दिवस को वैश्विक पहचान दी। ये सभी इतिहास के तथ्य हैं। लेकिन हमारे यहां तथ्य से ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो गया है कि तथ्य किसके पक्ष में जाता है।
इसलिए आज का सबसे बड़ा आसन शायद शीर्षासन नहीं, बल्कि “राजनीतिक आसन” है। इसमें व्यक्ति अपने पुराने बयान भूल जाता है, अपने इतिहास से दूरी बना लेता है और विरोध के लिए किसी भी दिशा में लचीला हो जाता है।
और अंत में,
योग का उद्देश्य शरीर और मन को जोड़ना है। राजनीति का उद्देश्य अक्सर बयान और स्मृति को अलग करना होता है।
और यही है भारत की महान Yoga Politics।
जहां नेहरू का शीर्षासन स्वीकार है, इंदिरा का योग भूल जाता है, धीरेंद्र ब्रह्मचारी इतिहास के फुटनोट बन जाते हैं और योग दिवस भी राजनीतिक बहस का विषय बन जाता है।
योग मुस्कुरा रहा होगा।
राजनीति अभी भी शीर्षासन कर रही है।


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