Career Switching | इन दिग्गजों ने की एक गलती, और बन गए मजाक!

Career Switching | जब विशेषज्ञ अपनी सीमा भूलकर दूसरे के मैदान में उतरते हैं, तब पैदा होते हैं हास्यास्पद दृश्य। पढ़िए "Focus Keyword: Career Switching" पर एक तीखा व्यंग्य, जो बताता है कि दूर के ढोल आखिर इतने सुहाने क्यों लगते हैं।


Career Switching | दूर के ढोल सुहाने: हर गली का ज्ञानी, हर मंच का महारथी!

भारत महान है। यहां हर दूसरा व्यक्ति डॉक्टर को बताता है कि इलाज कैसे करना चाहिए, क्रिकेटर को समझाता है कि चौका कैसे लगाना चाहिए, पत्रकार को बताता है कि सवाल कैसे पूछना चाहिए और नेता को ज्ञान देता है कि चुनाव कैसे जीता जाता है।

यानी देश में विशेषज्ञों की कोई कमी नहीं है। कमी है तो सिर्फ उस विनम्रता की, जो यह स्वीकार कर सके कि “भाई साहब, यह काम मेरे बस का नहीं है।”

हमारे समाज में एक पुरानी बीमारी है—दूसरे के काम को आसान समझना। अपनी नौकरी चाहे सुबह से शाम तक आत्मा निचोड़ ले, लेकिन सामने वाले का काम हमेशा “खाला का घर” लगता है।

यही कारण है कि जब कोई व्यक्ति अपने क्षेत्र में थोड़ी सफलता पा लेता है तो उसे लगने लगता है कि अब ब्रह्मांड की बाकी सारी नौकरियां भी उसी के लिए बनी हैं।

उसे लगता है कि अगर वह पत्रकारिता कर सकता है तो अभिनय भी कर सकता है। अगर कोचिंग पढ़ा सकता है तो राजनीति भी चला सकता है। अगर चुनावी रणनीति बना सकता है तो खुद मुख्यमंत्री भी बन सकता है।

और यहीं से शुरू होती है भारतीय महत्वाकांक्षा की कॉमेडी फिल्म।

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सफलता का नशा और सर्वज्ञता का भ्रम | Career Switching

सफलता बड़ी खतरनाक चीज है।

यह आदमी को मेहनती कम और सर्वज्ञ अधिक बना देती है।

किसी क्षेत्र में दस साल संघर्ष करने के बाद मिली उपलब्धि अचानक यह भ्रम पैदा कर देती है कि बाकी सारे क्षेत्र तो बच्चों का खेल हैं।

जैसे कोई व्यक्ति कार चलाना सीख जाए और अगले दिन बोइंग 747 उड़ाने पहुंच जाए।

तर्क उसका भी सही होता है।

“अरे भाई, दोनों में स्टीयरिंग ही तो पकड़ना है!”

फिर जब विमान रनवे छोड़कर खेत में उतरता है तो उसे समझ आता है कि दुनिया में कुछ चीजें वास्तव में कठिन भी होती हैं।

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पत्रकार से अभिनेता बनने का महान प्रयोग | Career Switching

पत्रकारिता में वर्षों की मेहनत के बाद जब कोई कैमरे के सामने सहज हो जाता है तो उसे लगता है कि अभिनय भी उसी का छोटा भाई होगा।

लेकिन कैमरे के सामने खबर पढ़ना और कैमरे के सामने अभिनय करना उतना ही अलग है जितना मोबाइल चलाना और मोबाइल बनाना।

दर्शक भी बड़े निर्दयी होते हैं।

वे वर्षों की पत्रकारिता भूल जाते हैं और एक खराब अभिनय देखकर आपको सीधे मीम फैक्ट्री का ब्रांड एंबेसडर घोषित कर देते हैं।

यानी जनता कहती है—

“सर, सवाल पूछना जारी रखिए। जवाब देने की कोशिश मत कीजिए।”

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राजनीति: देश का सबसे गलत समझा गया पेशा | Career Switching

भारत में राजनीति को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यह है कि यह सबसे आसान काम है।

चाय की दुकान पर बैठा व्यक्ति भी मानता है कि वह देश चला सकता है।

बस मौका नहीं मिला।

राजनीति के बारे में हमारी समझ कुछ ऐसी है जैसे शादी में खाना खाकर कोई मेहमान यह सोचने लगे कि अगली बार शादी वही आयोजित करेगा।

यहीं गलती कई बड़े-बड़े दिमाग कर बैठते हैं।

चुनावी रणनीति बनाना और चुनाव जीतना दो अलग-अलग चीजें हैं।

शादी में बैंड बजाना और दूल्हा बनना अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं।

लेकिन सफलता का चश्मा अक्सर यह अंतर दिखने नहीं देता।

फिर जनता लोकतंत्र का चश्मा पहनाकर वास्तविकता दिखा देती है।

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गुरुजी का राजनीतिक ज्ञान | Career Switching

हमारे देश में शिक्षक सबसे सम्मानित व्यक्ति होता है।

लेकिन सम्मान और वोट बैंक में वही अंतर है जो बोर्ड परीक्षा और विधानसभा चुनाव में होता है।

क्लासरूम में हजारों छात्रों को प्रभावित करना एक कला है।

लेकिन करोड़ों मतदाताओं को प्रभावित करना अलग विज्ञान है।

कई लोग इस भ्रम में रहते हैं कि तालियां और वोट एक ही चीज हैं।

जबकि राजनीति बार-बार साबित करती है कि दोनों का रिश्ता उतना ही कमजोर है जितना चुनावी वादों का महंगाई से।

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सिनेमा से संसद तक का सफर | Career Switching

बॉलीवुड और राजनीति का रिश्ता पुराना है।

फिल्मी पर्दे पर जनता को बचाने वाला नायक अक्सर सोचता है कि अब वास्तविक जनता को भी बचा लेगा।

लेकिन सिनेमा में निर्देशक स्क्रिप्ट लिखता है।

राजनीति में स्क्रिप्ट जनता लिखती है।

फिल्म में रीटेक मिल जाता है।

चुनाव में नहीं।

इसलिए कई सितारे राजनीति के मैदान में उतरते हैं और फिर समझते हैं कि यहां कैमरे से ज्यादा खतरनाक चीज मतदाता होता है।

वह टिकट खरीदकर नहीं, वोट देकर फैसला करता है।

निर्माता बनने का दर्द | Career Switching

हर अभिनेता को कभी न कभी लगता है कि फिल्म निर्माता होना बहुत आसान काम है।

उसे लगता है कि जो व्यक्ति पैसा लगा रहा है, वह तो बस कुर्सी पर बैठा होगा।

लेकिन जैसे ही वह खुद पैसा लगाता है, उसे समझ आता है कि निर्माता वह प्राणी है जो फिल्म बनने से पहले भी रोता है और रिलीज होने के बाद भी।

अभिनेता फ्लॉप होने पर अगली फिल्म कर लेता है।

निर्माता फ्लॉप होने पर अगला लोन भरता है।

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सोशल मीडिया का सर्वज्ञ समाज | Career Switching

आज सोशल मीडिया ने इस बीमारी को महामारी बना दिया है।

यहां हर व्यक्ति अर्थशास्त्री है।

हर व्यक्ति क्रिकेट विशेषज्ञ है।

हर व्यक्ति रणनीतिकार है।

हर व्यक्ति फिल्म समीक्षक है।

और सबसे बड़ी बात—हर व्यक्ति यह मानता है कि सामने वाला कुछ नहीं जानता।

मोबाइल हाथ में आते ही ज्ञान का ऐसा विस्फोट होता है कि न्यूटन, आइंस्टीन और चाणक्य भी सामूहिक रूप से बेरोजगार महसूस करने लगें।

दूसरे के जूते पहनकर देखिए | Career Switching

जीवन का सबसे बड़ा सत्य यही है कि हर पेशे की अपनी कठिनाइयां हैं।

जो मंच पर दिखता है, वह पूरी कहानी नहीं होती।

पत्रकार की मुश्किल अलग है।

अभिनेता की अलग।

शिक्षक की अलग।

राजनेता की अलग।

व्यापारी की अलग।

और आम आदमी की अलग।

लेकिन हम अक्सर परिणाम देखते हैं, प्रक्रिया नहीं।

फल देखते हैं, जड़ नहीं।

तालियां सुनते हैं, अभ्यास नहीं।

यही कारण है कि दूर के ढोल हमेशा सुहाने लगते हैं।

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और अंत में,

दुनिया में विशेषज्ञता का कोई शॉर्टकट नहीं है।

हर क्षेत्र अपने वर्षों के संघर्ष, असफलताओं और अनुभवों से बनता है।

इसलिए अगली बार जब आपको लगे कि सामने वाले का काम बहुत आसान है, तो एक बार उसके जूते पहनकर जरूर देखिए।

संभव है कि दो कदम चलने के बाद ही आपको अपने पुराने चप्पल सबसे प्यारे लगने लगें।

क्योंकि जीवन का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है—

हम अक्सर उस मैदान को आसान समझते हैं जिसमें हमने कभी खेला ही नहीं।

और जब खेलने उतरते हैं, तब पता चलता है कि दूर के ढोल सिर्फ सुहाने नहीं होते, कई बार कान भी फाड़ देते हैं।

लिखते रहेंगे….. सीतेश चौधरी


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देश बदल रहा है, व्यवस्था सुधर रही है, नेता सच बोल रहे हैं और सोशल मीडिया पर लोग शालीन हो चुके हैं। अगर आपको भी ऐसा लगता है, तो शायद आपको मेरे व्यंग्य पढ़ने की ज़रूरत है। मैं उन बातों पर लिखता हूँ जिन्हें देखकर आम आदमी सिर पकड़ लेता है और व्यवस्था प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला लेती है। मेरा उद्देश्य किसी को खुश या नाराज़ करना नहीं, बल्कि सच को हँसी के लिबास में पेश करना है। यह पेज उन लोगों के लिए है जो खबरों के बीच छिपे व्यंग्य को समझते हैं और हँसते-हँसते गंभीर बातें सोचने का साहस रखते हैं।"जहाँ तर्क थक जाता है, वहाँ व्यंग्य अपनी बात कहता है।"

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