Identity Pride | धरती पर लकीरें खींचने वाले, कल एक ही दौड़ में थे!
मनुष्य बड़ा अद्भुत प्राणी है। वह जिस चीज़ पर सबसे अधिक गर्व करता है, उसमें उसका अपना योगदान अक्सर सबसे कम होता है।
कोई कहता है, “मुझे गर्व है कि मैं फलाँ देश में पैदा हुआ।”
दूसरा कहता है, “मुझे गर्व है कि मैं अमुक धर्म में जन्मा हूँ।”
तीसरा छाती पीटते हुए घोषणा करता है, “हमारा खून सबसे शुद्ध है।”
और चौथा सोशल मीडिया पर राष्ट्र, जाति, भाषा, संस्कृति और पूर्वजों की उपलब्धियों का बोझ अपनी प्रोफाइल तस्वीर पर ढोता फिरता है, मानो उसने खुद इतिहास लिखकर रखा हो।
मगर प्रकृति कहीं कोने में बैठी यह सब देखकर मुस्कुरा रही होती है।
उसे पता है कि इन महाशयों की पूरी कहानी एक ऐसी घटना से शुरू हुई थी, जिसमें इनकी कोई भूमिका नहीं थी।
सच्चाई यह है कि हम सब उस ऐतिहासिक दौड़ के विजेता हैं, जिसमें भाग लेने का आवेदन पत्र तक हमने नहीं भरा था।
लाखों-करोड़ों शुक्राणुओं की अंधी मैराथन में कोई एक फिसलते-पड़ते लक्ष्य तक पहुँच गया और उसके बाद दुनिया में एक नया नागरिक पैदा हो गया।
Identity Pride
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अब उस संयोग के विजेता महोदय बड़े होकर घोषणा कर रहे हैं कि वे विशेष हैं।
कल्पना कीजिए, अगर उस दौड़ में दूसरा शुक्राणु जीत गया होता तो आज कोई और व्यक्ति फेसबुक पर ज्ञान बाँट रहा होता और आप कहीं अस्तित्वहीनता की शांति में पड़े होते।
लेकिन नहीं।
मनुष्य को अपनी वास्तविकता से अधिक अपने भ्रम प्रिय हैं।
इसलिए जन्म लेते ही उसे पहचानों की किट थमा दी जाती है।
देश।
धर्म।
जाति।
भाषा।
समुदाय।
क्षेत्र।
फिर उसे सिखाया जाता है कि बेटा, अब इन्हीं के लिए जीना है, इन्हीं पर गर्व करना है और ज़रूरत पड़े तो इन्हीं के नाम पर लड़ना भी है।
बच्चा बेचारा सोचता है कि शायद उसने जन्म से पहले कोई फॉर्म भरा होगा, जिसमें उसने देश और धर्म का चयन किया होगा।
जबकि हकीकत यह है कि उसका चुनाव उतना ही था जितना ट्रेन में जन्मे मच्छर का यह तय करना कि उसे किस डिब्बे में पैदा होना है।
लेकिन हमारी सामाजिक फैक्ट्री इस संयोग को उपलब्धि में बदलने की विशेषज्ञ है।
कोई भारत में पैदा हुआ तो वह गर्वित।
कोई अमेरिका में पैदा हुआ तो वह भी गर्वित।
कोई जापान में पैदा हुआ तो वह भी गर्वित।
अर्थात् जहाँ भी पैदा हो जाओ, गर्व करने का लाइसेंस स्वतः जारी हो जाता है।
मजेदार बात यह है कि पृथ्वी पर लगभग हर देश का नागरिक अपने देश को महान बताता है।
अगर सब महान हैं तो फिर सामान्य कौन है?
शायद पृथ्वी पर सामान्य होने का लाइसेंस किसी को मिला ही नहीं।
Identity Pride
Identity Pride
धर्म के क्षेत्र में भी यही दृश्य है।
हर धर्म के अनुयायी को विश्वास है कि सत्य का अंतिम ठेका उसी के पास है।
जैसे परमात्मा ने कोई टेंडर निकाला हो और वह अकेला सफल बोलीदाता निकला हो।
पर कोई यह नहीं पूछता कि अगर उसका जन्म किसी दूसरे घर में हुआ होता तो क्या उसके विचार भी यही होते?
यदि एक बच्चा अफ्रीका में जन्म लेता है, दूसरा खाड़ी देश में और तीसरा यूरोप में, तो उनके विश्वास अलग-अलग क्यों होते हैं?
क्या सत्य भी जन्म प्रमाण पत्र देखकर बदल जाता है?
असल समस्या गर्व नहीं है।
समस्या वह अहंकार है जो गर्व के पीछे छिपा बैठा है।
जब कोई कहता है, “मेरा देश महान है”, तो अक्सर उसके मन का दूसरा वाक्य होता है, “और शायद तुम्हारा उतना नहीं।”
जब कोई कहता है, “मेरा धर्म श्रेष्ठ है”, तो उसके भीतर कहीं न कहीं यह भावना भी पल रही होती है कि बाकी लोग कुछ कमतर हैं।
यही Identity Pride धीरे-धीरे तुलना बनता है।
तुलना प्रतिस्पर्धा बनती है।
प्रतिस्पर्धा संघर्ष बनती है।
और संघर्ष अंततः विभाजन में बदल जाता है।
Identity Pride
Identity Pride
मनुष्य ने पृथ्वी पर जितनी सीमाएँ खींची हैं, शायद प्रकृति ने उतनी कभी नहीं खींचीं।
ऊपर से देखने पर धरती एक ही दिखाई देती है।
नदियाँ वीज़ा नहीं माँगतीं।
हवाएँ पासपोर्ट नहीं देखतीं।
बादल धर्म नहीं पूछते।
सूरज राष्ट्रीयता नहीं जाँचता।
लेकिन मनुष्य ने नक्शे पर लकीरें खींचीं और फिर उन लकीरों के लिए मरने-मारने को तैयार हो गया।
विडंबना यह है कि जिन लोगों ने कभी सीमा नहीं बनाई, वे सीमा बचाने के नाम पर लड़ते हैं।
जिन्होंने धर्म नहीं बनाया, वे धर्म के नाम पर झगड़ते हैं।
जिन्होंने इतिहास नहीं रचा, वे इतिहास पर गर्व करते हैं।
और जिनका जन्म केवल जैविक संयोग था, वे स्वयं को ब्रह्मांड की विशेष परियोजना मान बैठे हैं।
कल्पना कीजिए एक वैश्विक सम्मेलन हो।
उसमें दुनिया के सारे लोग इकट्ठा हों।
और मंच पर घोषणा हो:
“सम्मानित देवियों और सज्जनों, कृपया याद रखिए कि आप सभी कभी न कभी केवल एक शुक्राणु थे।”
बस, सम्मेलन यहीं समाप्त हो जाएगा।
क्योंकि अचानक सभी श्रेष्ठताएँ सिकुड़ जाएँगी।
राजा और रंक बराबर दिखने लगेंगे।
धर्मगुरु और नास्तिक एक ही जैविक कहानी के पात्र लगेंगे।
राष्ट्रवादी और वैश्विक नागरिक एक ही संयोग के उत्पाद प्रतीत होंगे।
Identity Pride
Identity Pride
लेकिन मनुष्य को सरल सत्य पसंद नहीं।
उसे जटिल भ्रम पसंद हैं।
उसे यह विश्वास प्रिय है कि वह विशेष है।
अद्वितीय है।
चुना हुआ है।
जबकि ब्रह्मांड की विशालता में उसकी स्थिति समुद्र की एक बूंद से भी छोटी है।
और अंत में,
सबसे बड़ा हास्य तो यही है कि दो “स्पर्म” जब बड़े होते हैं तो जमीन पर लकीरें खींच लेते हैं।
फिर एक कहता है, “मैं श्रेष्ठ हूँ।”
दूसरा कहता है, “नहीं, मैं श्रेष्ठ हूँ।”
और दोनों भूल जाते हैं कि कुछ दशक पहले वे दोनों एक ही जैविक दौड़ के प्रतिभागी थे।
एक संयोग दूसरे संयोग से लड़ रहा है।
एक दुर्घटना दूसरी दुर्घटना को नीचा दिखाने में लगी है।
और ब्रह्मांड यह सब देखकर शायद वही सोच रहा है जो कोई समझदार दर्शक सर्कस देखकर सोचता है—
“मनुष्य सचमुच मनोरंजक प्राणी है।”
इसलिए अगली बार जब आपको अपने जन्मस्थान, धर्म, जाति, भाषा या किसी विरासत पर अत्यधिक गर्व महसूस हो, तो एक पल ठहरकर सोचिए।
क्या यह आपकी उपलब्धि है?
या सिर्फ एक जैविक लॉटरी का टिकट, जो अनजाने में आपके नाम निकल आया?
क्योंकि यदि जन्म संयोग है, तो श्रेष्ठता का दावा भी शायद सबसे बड़ा भ्रम है।
और शायद सभ्यता की शुरुआत वहीं से होगी, जहाँ मनुष्य यह स्वीकार कर लेगा कि वह पहले इंसान है, बाकी सारी पहचानें बाद में हैं।





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