Khan Sir Controversy | जब ब्लैकबोर्ड हार गया और एल्गोरिदम जीत गया

Khan Sir Controversy पर व्यंग्यात्मक लेख, जिसमें शिक्षक, यूट्यूबर, व्यूज़, वायरल कंटेंट और सोशल मीडिया की नई शिक्षा व्यवस्था पर तीखा कटाक्ष किया गया है।


Khan Sir Controversy | ब्लैकबोर्ड गायब, बकबक हाज़िर!

आजकल भारत में शिक्षक होने के लिए ज्ञान की आवश्यकता है या ट्रेंडिंग होने की? यह प्रश्न उतना ही जटिल हो चुका है जितना किसी सरकारी फॉर्म में “अन्य” वाले कॉलम का उद्देश्य समझना।

एक समय था जब शिक्षक की पहचान उसके ब्लैकबोर्ड से होती थी। हाथ में चॉक, चेहरे पर गंभीरता और विद्यार्थियों के मन में भय मिश्रित सम्मान। लेकिन अब शिक्षा का नया संस्करण लॉन्च हो चुका है। इसमें चॉक की जगह कैमरा है, ब्लैकबोर्ड की जगह रिंग लाइट है और कक्षा की जगह कमेंट सेक्शन।

अब ज्ञान कम और नोटिफिकेशन ज्यादा बजते हैं।

सोशल मीडिया के इस युग में शिक्षक और इन्फ्लुएंसर के बीच का अंतर उसी तरह धुंधला हो गया है जैसे चुनावी घोषणापत्र और वास्तविकता के बीच का अंतर।

Khan Sir Controversy

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कुछ लोग कहते हैं कि फलां व्यक्ति महान शिक्षक हैं। कुछ कहते हैं कि वे महान वक्ता हैं। कुछ कहते हैं कि वे महान यूट्यूबर हैं। और कुछ लोग इतने भ्रमित हैं कि उन्हें स्वयं नहीं पता कि वे किसकी प्रशंसा कर रहे हैं।

दरअसल समस्या यह नहीं है कि कोई व्यक्ति लोकप्रिय क्यों है। समस्या यह है कि लोकप्रियता को ही योग्यता का प्रमाणपत्र मान लिया गया है।

आजकल अगर किसी वीडियो पर करोड़ों व्यूज़ आ जाएं तो जनता मान लेती है कि उसमें अवश्य ही कोई अद्भुत ज्ञान होगा। जबकि कई बार स्थिति ऐसी होती है जैसे किसी शादी में लोग खाने की गुणवत्ता छोड़कर सिर्फ डीजे की आवाज़ पर चर्चा कर रहे हों।

सोशल मीडिया का नया सिद्धांत बड़ा सरल है—

“जो ज्यादा बोलेगा, वही ज्यादा चलेगा।”

अब पुराने जमाने के शिक्षक बेचारे क्या करें? वे तो वर्षों तक पढ़ाते रहे, कॉपियां जांचते रहे, परीक्षा करवाते रहे और अंत में उन्हें एक स्टाफ रूम की कुर्सी नसीब हुई।

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उधर डिजिटल युग के महारथी एक वीडियो डालते हैं और लाखों लोग कमेंट में लिख देते हैं—

“सर, आपने जिंदगी बदल दी।”

कौन सी जिंदगी बदली, कैसे बदली, कितनी बदली—यह प्रश्न पूछना आजकल असभ्यता माना जाता है।

सबसे रोचक दृश्य तब दिखाई देता है जब शिक्षा और मनोरंजन का गठबंधन हो जाता है।

तब पढ़ाई कम और परफॉर्मेंस ज्यादा दिखाई देती है।

विद्यार्थी नोट्स कम बनाते हैं, स्क्रीनशॉट ज्यादा लेते हैं।

ज्ञान कम याद रहता है, डायलॉग ज्यादा याद रहते हैं।

ऐसा लगता है मानो पूरा देश किसी विशाल रियलिटी शो में भाग ले रहा हो जिसका नाम है—”इंडियाज़ नेक्स्ट वायरल टीचर।”

इस प्रतियोगिता में विजेता वही है जिसके बयान पर सबसे ज्यादा बहस हो जाए।

अगर किसी दिन कोई शिक्षक केवल पढ़ाने लगे, किसी पर टिप्पणी न करे, किसी विवाद में न पड़े, किसी को टैग न करे और केवल विषय की चर्चा करे तो संभव है कि एल्गोरिदम स्वयं उससे नाराज़ हो जाए।

क्योंकि एल्गोरिदम को गणित से ज्यादा ड्रामा पसंद है।

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यूट्यूब की दुनिया में ज्ञान का मूल्य अब उस सब्जी की तरह हो गया है जिसे लोग खरीदने तो जाते हैं लेकिन रास्ते में चाट देखकर भूल जाते हैं।

लोग कहते हैं कि सच्चा शिक्षक वह होता है जो विद्यार्थियों को विषय समझाए।

लेकिन आधुनिक युग में विषय समझाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वीडियो कितनी देर तक दर्शक को रोके रखता है।

यहां शिक्षा नहीं, रिटेंशन रेट मायने रखता है।

ज्ञान नहीं, एंगेजमेंट मायने रखता है।

और सबसे बढ़कर, सत्य नहीं बल्कि ट्रेंड मायने रखता है।

इसी बीच टीवी चैनल भी पीछे नहीं हैं।

उन्हें भी मालूम है कि बहस जितनी तीखी होगी, टीआरपी उतनी ऊंची होगी।

इसलिए एक तरफ यूट्यूबर हैं, दूसरी तरफ एंकर हैं और बीच में बेचारा दर्शक है जो यह तय नहीं कर पा रहा कि वह पढ़ाई कर रहा है, राजनीति देख रहा है या मनोरंजन का कोई नया संस्करण।

कभी-कभी तो लगता है कि पूरा देश एक ऐसे स्टूडियो में बदल चुका है जहां हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को गलत साबित करने में व्यस्त है।

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ज्ञान की चर्चा बाद में होगी।

पहले विवाद तय होगा।

फिर क्लिप कटेगी।

फिर शेयर होगी।

फिर रील बनेगी।

फिर व्यूज़ आएंगे।

फिर कमाई होगी।

और अंत में जनता घोषणा करेगी—

“वाह! क्या शानदार बौद्धिक विमर्श था!”

आज के समय में किसी भी विवाद का सबसे बड़ा लाभार्थी सत्य नहीं, बल्कि एल्गोरिदम होता है।

वह चुपचाप बैठकर दोनों पक्षों को लड़ते हुए देखता है और विज्ञापन की कमाई गिनता रहता है।

उसे न शिक्षा से मतलब है, न पत्रकारिता से।

उसे केवल ट्रैफिक चाहिए।

और हम सब मिलकर उसे ट्रैफिक दे रहे हैं।

विडंबना यह है कि जो लोग दूसरों को कोसते हैं, वे भी उसी व्यवस्था का हिस्सा होते हैं जिससे उन्हें शिकायत होती है।

जितना बड़ा विवाद, उतनी बड़ी पहुंच।

जितनी बड़ी पहुंच, उतनी बड़ी कमाई।

और जितनी बड़ी कमाई, उतना बड़ा आदर्शवाद।

इसलिए आजकल हर बहस को देखकर मुझे पुराने जमाने का ब्लैकबोर्ड याद आता है।

वह बेचारा कोने में खड़ा सोचता होगा—

“मेरे ऊपर कभी गणित लिखा जाता था, विज्ञान लिखा जाता था, इतिहास लिखा जाता था। अब मेरे स्थान पर बहसें लिखी जा रही हैं।”

शायद इसी कारण चॉक भी उदास होगी।

उसे लगता होगा कि वह शिक्षा का उपकरण थी।

लेकिन आजकल शिक्षा स्वयं कंटेंट बन चुकी है।

अंततः प्रश्न किसी एक व्यक्ति का नहीं है।

प्रश्न उस व्यवस्था का है जिसमें शिक्षक, पत्रकार, यूट्यूबर, इन्फ्लुएंसर और दर्शक सभी मिलकर लोकप्रियता को ज्ञान का पर्याय बनाने लगे हैं।

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और अंत में,

जिस दिन हम व्यूज़ और विद्वता के बीच का अंतर समझ लेंगे, उस दिन शायद ब्लैकबोर्ड फिर से सम्मान पाएगा।

तब तक कैमरे चलते रहेंगे, बहसें होती रहेंगी, क्लिप्स वायरल होती रहेंगी और जनता हर नए विवाद को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का हिस्सा मानती रहेगी।

क्योंकि आधुनिक भारत में शिक्षा का नया सूत्र बहुत सरल है—

“जहां विवाद, वहीं प्रचार।
जहां प्रचार, वहीं व्यूज़।
जहां व्यूज़, वहीं महिमा।”

और ब्लैकबोर्ड?

वह अब भी कोने में खड़ा इंतजार कर रहा है कि कोई आकर उस पर दो लाइन ज्ञान की भी लिख दे।

लिखते रहेंगे……. सीतेश चौधरी

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देश बदल रहा है, व्यवस्था सुधर रही है, नेता सच बोल रहे हैं और सोशल मीडिया पर लोग शालीन हो चुके हैं। अगर आपको भी ऐसा लगता है, तो शायद आपको मेरे व्यंग्य पढ़ने की ज़रूरत है। मैं उन बातों पर लिखता हूँ जिन्हें देखकर आम आदमी सिर पकड़ लेता है और व्यवस्था प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला लेती है। मेरा उद्देश्य किसी को खुश या नाराज़ करना नहीं, बल्कि सच को हँसी के लिबास में पेश करना है। यह पेज उन लोगों के लिए है जो खबरों के बीच छिपे व्यंग्य को समझते हैं और हँसते-हँसते गंभीर बातें सोचने का साहस रखते हैं।"जहाँ तर्क थक जाता है, वहाँ व्यंग्य अपनी बात कहता है।"

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