Land Encroachment | 2 इंच जमीन के लिए कैसे बर्बाद हो जाता है पूरा गांव?

Land Encroachment | गांवों में भूमि अतिक्रमण करने वाले मेढ़ काटू लोगों पर तीखा व्यंग्य। कैसे कुछ इंच जमीन के लालच में गांव का माहौल, रिश्ते और कानून सब उलझ जाते हैं, पढ़िए कटाक्षपूर्ण अंदाज में।


Land Encroachment | भूमि अतिक्रमण: गांव की सबसे विकसित और खतरनाक प्रजाति

भारत गांवों का देश है। गांव खेतों से बनते हैं, खेत मेढ़ों से बनते हैं और मेढ़ों को काटने वाले लोगों से गांव का इतिहास बनता है। अगर गांवों में कोई ऐसी प्रजाति है जिसने बिना किसी सरकारी योजना, बिना किसी स्टार्टअप फंडिंग और बिना किसी तकनीकी शिक्षा के निरंतर विकास किया है, तो वह है “मेढ़ काटू समाज”

ये लोग गांव के सबसे मेहनती जीव होते हैं। दिन में चाहे खेत में काम करें या न करें, लेकिन दूसरे की मेढ़ पर उनकी निगाह ऐसी रहती है जैसे शेयर मार्केट पर निवेशकों की। जिस तरह वैज्ञानिक चांद पर पानी खोजते हैं, उसी तरह ये लोग पड़ोसी की जमीन में अपने लिए दो-चार इंच जगह खोज लेते हैं।

इनका जीवन दर्शन बहुत सरल होता है- “अपनी जमीन बढ़ाओ, चाहे दूसरे की घटाओ।”

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दो इंच जमीन का महाभारत

सामान्य व्यक्ति दो इंच जमीन को नजरअंदाज कर सकता है, लेकिन मेढ़ काटू समाज के लिए यही दो इंच भविष्य का साम्राज्य होता है। आज दो इंच, कल चार इंच, फिर छह इंच। धीरे-धीरे पूरी मेढ़ ऐसी टेढ़ी हो जाती है कि अगर कोई भूगोल का छात्र उसे देख ले तो पृथ्वी की नई सीमा रेखा घोषित कर दे। इनकी कला इतनी सूक्ष्म होती है कि एक दिन में कुछ नहीं दिखता। लेकिन पांच साल बाद जब नापी होती है तो पता चलता है कि खेत का नक्शा बिहार से निकलकर नेपाल की सीमा तक पहुंच गया है।

सड़क काटने का महान राष्ट्रीय अभियान

मेढ़ काटना इनके करियर का पहला चरण है। दूसरा चरण होता है सड़क काटना। गांव में कोई रास्ता बना नहीं कि इन्हें बेचैनी शुरू हो जाती है। इन्हें लगता है कि सड़क जनता के लिए नहीं, बल्कि उनकी निजी संपत्ति पर हमला करने के लिए बनाई गई है।

फिर शुरू होता है कटाव अभियान। सड़क का थोड़ा हिस्सा काटो, फिर थोड़ा और काटो। बरसात आए तो सड़क बह जाए और गांव वाले कीचड़ में तैरते रहें। लेकिन इनका हृदय संतुष्ट रहता है क्योंकि उन्होंने विकास के खिलाफ सफल संघर्ष किया होता है। अगर कोई ट्रैक्टर गलती से उस रास्ते से निकल जाए तो फिर ऐसा बवाल होता है जैसे किसी ने संयुक्त राष्ट्र की सीमा तोड़ दी हो।

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ट्रैक्टर का पहिया और विश्व युद्ध

गांव में ट्रैक्टर का पहिया किसी मेढ़ काटू व्यक्ति की कथित जमीन पर चढ़ जाए तो समझिए तीसरे विश्व युद्ध की घोषणा हो चुकी है। अचानक वहां विशेषज्ञों की भीड़ जुट जाती है। कोई कहता है, “पूरा एक फुट अंदर चला गया है।” दूसरा कहता है, “नहीं, डेढ़ फुट।” तीसरा तो ड्रोन की तरह ऊपर से अनुमान लगाकर बताता है कि कम से कम तीन फुट कब्जा हो गया है।

जिस व्यक्ति ने ट्रैक्टर चलाया होता है, उसे देखकर ऐसा व्यवहार किया जाता है जैसे उसने खेत नहीं, संसद भवन कुचल दिया हो।

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गांव की लड़ाई का स्टार्टअप मॉडल

गांव में झगड़े की शुरुआत कैसे होती है? इस विषय पर शोध किया जाए तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि अधिकांश मामलों में शुरुआती निवेश मेढ़ काटू समाज ही करता है। पहले मेढ़ काटो। फिर सामने वाले को उकसाओ। फिर पंचायत बुलाओ। फिर पंचायत की बात मत मानो। फिर बहस करो। फिर गाली दो। फिर कुदाल उठाओ। और अंत में पुलिस बुलाओ।

यह पूरा प्रोसेस इतना व्यवस्थित होता है कि किसी मैनेजमेंट संस्थान में इसे “ग्रामीण विवाद प्रबंधन मॉडल” के रूप में पढ़ाया जा सकता है।

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कुदाल से कानून तक का सफर

जब दोनों तरफ से कुदाल चलने लगती है तो गांव का मनोरंजन शुरू होता है। लोग अपने-अपने घरों से निकल आते हैं। कुछ लोग बीच-बचाव करने आते हैं। कुछ लोग आग में घी डालने आते हैं। और कुछ लोग केवल लाइव टेलीकास्ट देखने आते हैं।

फिर कोई समझदार व्यक्ति कहता है, “पुलिस बुलाओ।” जैसे ही पुलिस का नाम आता है, दोनों पक्ष अचानक संविधान विशेषज्ञ बन जाते हैं। जो लोग पांच मिनट पहले एक-दूसरे का सिर फोड़ने पर आमादा थे, वे अब कानूनी अधिकारों और न्याय व्यवस्था पर भाषण देने लगते हैं।

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लेखपाल साहब का दिव्य अवतार

जब मामला हाथ से निकल जाता है तो गांव में एक विशेष देवता का स्मरण किया जाता है- लेखपाल साहब। लेखपाल साहब का आगमन किसी फिल्मी हीरो की एंट्री से कम नहीं होता। सभी लोग उनकी ओर उम्मीद से देखते हैं। कुछ लोग उन्हें चाय पिलाते हैं। कुछ लोग मिठाई खिलाते हैं। कुछ लोग पुराने संबंध याद दिलाते हैं। और कुछ लोग उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं कि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण भी उनकी तरफ है।

लेकिन असली मजा तब आता है जब नापी शुरू होती है। जिस व्यक्ति को पूरा विश्वास होता है कि जमीन उसकी है, वही सबसे ज्यादा घबराया हुआ दिखता है।

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लालच का अनंत विस्तार

गांव की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो व्यक्ति पहले से पर्याप्त जमीन का मालिक होता है, अक्सर वही सबसे ज्यादा लालची निकलता है। उसे अपने खेत की उपज से ज्यादा खुशी पड़ोसी की जमीन कम होने में मिलती है। यह लालच कभी खत्म नहीं होता। एक मेढ़ मिलने के बाद दूसरी मेढ़ चाहिए। एक फुट मिलने के बाद दूसरा फुट चाहिए।

और आखिर में पूरी जिंदगी इसी गणित में निकल जाती है कि किसका खेत कितना अंदर खिसकाया जा सकता है।

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गांव का विकास बनाम मेढ़ का विकास

देश हाईवे बना रहा है। शहर मेट्रो बना रहे हैं। दुनिया मंगल ग्रह पर पहुंच रही है। लेकिन गांव में कुछ लोग अब भी मेढ़ को आधा फुट आगे बढ़ाने की परियोजना पर काम कर रहे हैं। उनकी महत्वाकांक्षा इतनी विशाल होती है कि अगर वही ऊर्जा खेती, शिक्षा या व्यापार में लगाई जाए तो शायद पूरा गांव समृद्ध हो जाए।

लेकिन नहीं। उनका लक्ष्य केवल एक होता है- पड़ोसी की नींद हराम करना।

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और अंत में,

गांव की शांति को सबसे बड़ा खतरा सूखा, बाढ़ या महंगाई नहीं देती। कई बार सबसे बड़ा संकट उन लोगों से आता है जो भूमि अतिक्रमण को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान लेते हैं। वे कुछ इंच जमीन के लिए रिश्ते तोड़ देते हैं, भाईचारा खत्म कर देते हैं और गांव को अदालत, थाने और तहसील के चक्कर में डाल देते हैं।

विडंबना यह है कि अंत में न जमीन साथ जाती है, न मेढ़। लेकिन झगड़े की विरासत पीढ़ियों तक चलती रहती है। इसलिए अगर गांव में शांति चाहिए तो मेढ़ों की रक्षा कीजिए, क्योंकि जहां मेढ़ सुरक्षित है, वहां रिश्ते सुरक्षित हैं। और जहां मेढ़ काटू समाज सक्रिय है, वहां अगला विवाद बस कुछ इंच दूर खड़ा है।

लिखते रहेंगे……सीतेश चौधरी

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देश बदल रहा है, व्यवस्था सुधर रही है, नेता सच बोल रहे हैं और सोशल मीडिया पर लोग शालीन हो चुके हैं। अगर आपको भी ऐसा लगता है, तो शायद आपको मेरे व्यंग्य पढ़ने की ज़रूरत है। मैं उन बातों पर लिखता हूँ जिन्हें देखकर आम आदमी सिर पकड़ लेता है और व्यवस्था प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला लेती है। मेरा उद्देश्य किसी को खुश या नाराज़ करना नहीं, बल्कि सच को हँसी के लिबास में पेश करना है। यह पेज उन लोगों के लिए है जो खबरों के बीच छिपे व्यंग्य को समझते हैं और हँसते-हँसते गंभीर बातें सोचने का साहस रखते हैं।"जहाँ तर्क थक जाता है, वहाँ व्यंग्य अपनी बात कहता है।"

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