WhatsApp University | Forward Factory का संविधान: WhatsApp University के कुलपतियों का महाग्रंथ
सुबह के पाँच बजे हैं। मुर्गे ने अभी लोकतंत्र के सम्मान में पहली बांग भी नहीं दी है, लेकिन देश का पहला “राष्ट्रनिर्माण अभियान” शुरू हो चुका है। किसी मोबाइल की घंटी बजी और स्क्रीन पर संदेश चमका-
“इसे 25 लोगों को भेजो, नहीं तो इतिहास तुमसे नाराज़ हो जाएगा।”
इतिहास बेचारा सोच रहा होगा कि उसे नाराज़ होने का समय कब मिला? वह तो अभी तक खुद यह समझने में लगा है कि उसे हर सुबह नया जन्म क्यों लेना पड़ रहा है।
बस, चाय उबलने से पहले इतिहास उबल गया। रसोई में दूध कम उफना, लेकिन मोबाइल में राष्ट्रवाद, धर्म, जाति और संस्कृति का तापमान सौ डिग्री पार कर गया।
WhatsApp University
कभी ज्ञान के लिए लोग पुस्तकालय जाते थे। आज पुस्तकालय जेब में है, लेकिन खुलता नहीं। उसकी जगह WhatsApp University खुल जाती है, जहाँ प्रवेश परीक्षा नहीं, केवल “Forward” बटन दबाने की योग्यता चाहिए। यहाँ शोधपत्र नहीं लिखे जाते, केवल संदेश कॉपी-पेस्ट किए जाते हैं। संदर्भ ग्रंथों की जगह स्क्रीनशॉट चलते हैं और प्रमाण का सबसे बड़ा स्रोत होता है-“एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने बताया है…”
वरिष्ठ वैज्ञानिक कौन?
यह प्रश्न पूछना राष्ट्रविरोध की प्रारंभिक अवस्था माना जाता है।
इस विश्वविद्यालय की सबसे अद्भुत व्यवस्था यह है कि यहाँ हर विद्यार्थी जन्म लेते ही कुलपति बन जाता है। न कोई प्रोफेसर, न कोई परीक्षा, न कोई शोध-निर्देशक। जिसने जितने अधिक फॉरवर्ड किए, उसका उतना बड़ा बौद्धिक कद।
यहाँ डिग्री भी अनोखी है। दस हज़ार संदेश भेजने पर “इतिहासाचार्य”, पच्चीस हज़ार पर “संविधान विशेषज्ञ”, पचास हज़ार पर “राष्ट्रचिंतक” और एक लाख फॉरवर्ड पूरे करते ही “डिजिटल ऋषि” की मानद उपाधि स्वतः मिल जाती है।
आजकल इतिहास का नया संस्करण मोबाइल नेटवर्क की स्पीड से अपडेट होता है। 5G पर इतिहास तेज़ी से बदलता है, 4G पर थोड़ा धीरे और जहाँ नेटवर्क नहीं आता, वहाँ पुराना इतिहास अब भी बचा हुआ है।
कल जो महापुरुष राष्ट्रनिर्माता थे, आज षड्यंत्रकारी घोषित हो चुके हैं। जिनको कल खलनायक बताया गया था, आज वे विश्वगुरु हैं। अगले सप्ताह शायद दोनों की भूमिकाएँ फिर बदल जाएँगी।
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इतिहास अब अभिलेखागार में नहीं मिलता।
इतिहास अब “Good Morning” वाले ग्रुप में सुबह 6:17 बजे मिलता है।
इतिहासकार वर्षों तक धूल भरे दस्तावेज़ पढ़ते रहे। उन्हें कहाँ पता था कि असली शोध तो उस अंकल के पास है, जिनकी प्रोफ़ाइल फोटो में तिरंगा, शेर, भगवान, सैनिक और “No DM” एक साथ लगा हुआ है।
हर फॉरवर्ड की शुरुआत लगभग एक जैसी होती है-
“अगर आप सच्चे भारतीय हैं तो इसे पूरा पढ़िए।”
यानी जिसने संदेश नहीं पढ़ा, उसकी नागरिकता तत्काल प्रभाव से निलंबित मानी जाएगी।
इसके बाद लिखा होता है-
“99% लोग यह सच नहीं जानते।”
और आश्चर्य यह कि यह संदेश रोज़ करोड़ों लोगों तक पहुँचता है, फिर भी 99% लोग हर दिन अज्ञानी ही बने रहते हैं।
यह गणित शायद केवल WhatsApp University के सांख्यिकी विभाग में ही पढ़ाया जाता होगा।
आज हर व्यक्ति अपने-अपने महापुरुष का पीआर मैनेजर बन चुका है। कोई अपने नायक को भगवान से बड़ा सिद्ध करने में लगा है, तो कोई दूसरे के नायक को मिट्टी में मिलाने का ठेका लेकर बैठा है।
ऐसा प्रतीत होता है कि देश की सबसे बड़ी समस्या महँगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य या पर्यावरण नहीं, बल्कि यह है कि किसके महापुरुष की मूँछ दो इंच लंबी थी और किसने किसे कितनी बार हराया।
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विडंबना देखिए।
जिन महापुरुषों ने समाज को जोड़ने का प्रयास किया, उनके नाम पर समाज को बाँटने का स्टार्टअप करोड़ों की वैल्यूएशन हासिल कर चुका है।
राजनीति भी कमाल की कलाकार है।
उसे पता है कि अगर जनता सड़क, अस्पताल, रोजगार और शिक्षा पर बहस करेगी तो जवाब देना पड़ेगा।
इसलिए बहस को मोड़ दो।
इतिहास की तरफ़।
जाति की तरफ़।
धर्म की तरफ़।
जनता उसी उत्साह से भिड़ जाती है, जैसे पड़ोस की शादी में मुफ्त का खाना मिलने वाला हो।
उधर नेता मुस्कुराता है।
टीवी मुस्कुराता है।
एल्गोरिद्म मुस्कुराता है।
और जनता कमेंट बॉक्स में एक-दूसरे की सात पीढ़ियों का इतिहास सुधारने लगती है।
सोशल मीडिया ने एक नया संवैधानिक पद भी बना दिया है- डिजिटल धर्माचार्य।
इनकी योग्यता अद्भुत होती है।
न इन्होंने पूरा धर्मग्रंथ पढ़ा होता है।
न संविधान।
न इतिहास।
लेकिन अंतिम सत्य इन्हीं के पास होता है।
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यदि आप प्रमाण माँग लें तो उत्तर आता है-
“खुद रिसर्च करो।”
आप रिसर्च करते हैं।
पता चलता है कि रिसर्च का स्रोत वही फॉरवर्ड है, जिसे वे प्रमाण बता रहे थे।
इतना आत्मनिर्भर ज्ञान शायद दुनिया के किसी विश्वविद्यालय में नहीं मिलता।
अब हर समुदाय के पास अपना-अपना आईना है।
उसमें उसे अपनी सारी अच्छाइयाँ और दूसरे की सारी बुराइयाँ दिखाई देती हैं।
समस्या अपने समाज से प्रेम करना नहीं है।
समस्या तब शुरू होती है, जब प्रेम की शर्त किसी दूसरे से घृणा बना दी जाती है।
यही Forward Factory का सबसे सफल उत्पाद है।
सोशल मीडिया ने इतिहास को क्रिकेट मैच बना दिया है।
एक टीम इधर।
दूसरी टीम उधर।
तीसरी टीम कमेंट सेक्शन में।
और सच्चाई?
वह अंपायर बनना चाहती है, लेकिन उसे मैदान में उतरने ही नहीं दिया जाता।
क्योंकि सच्चाई वायरल नहीं होती।
वायरल हमेशा अतिशयोक्ति होती है।
वायरल हमेशा सनसनी होती है।
वायरल हमेशा वही होता है जो हमारे पूर्वाग्रहों को थपकी दे।
WhatsApp University
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आज हर व्यक्ति स्वयं को “तथ्यवादी” कहता है, लेकिन तथ्य वही स्वीकार करता है जो उसकी राय से मेल खाते हों।
बाकी सब “प्रोपेगेंडा” है।
कभी-कभी लगता है कि इतिहास भी ऊपर बैठा भगवान से शिकायत करता होगा-
“प्रभु! मुझे किताबों से निकालकर मीम क्यों बना दिया?”
लोकतंत्र की असली ताकत बहस है।
लेकिन बहस तभी तक सुंदर है, जब तक उसमें तर्क हैं।
जैसे ही तर्क की जगह गालियाँ ले लेती हैं, बहस समाप्त हो जाती है और केवल शोर बचता है।
हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि मोबाइल स्मार्ट होते गए, लेकिन संवाद कम समझदार।
कभी-कभी कल्पना कीजिए-
अगर इतिहास के सारे महापुरुष आज जीवित होते तो सबसे पहले क्या करते?
शायद वे प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाते।
और कहते-
“भाइयों, हमने ऐसा कभी नहीं कहा था।”
“यह फोटो हमारी नहीं है।”
“यह उद्धरण भी हमारा नहीं है।”
“और कृपया हमारे नाम पर रोज़ नई लड़ाई मत शुरू कीजिए।”
लेकिन तब तक देर हो चुकी होती।
क्योंकि फॉरवर्ड पाँच लाख लोगों तक पहुँच चुका होता।
और सत्य अभी भी स्क्रीन पर केवल एक शब्द बनकर चमक रहा होता-
Typing…
यही हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य है।
झूठ हाई-स्पीड इंटरनेट पर दौड़ता है।
सत्य पैदल चलता है।
फॉरवर्ड को प्रमाण नहीं चाहिए।
उसे केवल भावना चाहिए।
क्रोध चाहिए।
डर चाहिए।
पहचान की राजनीति चाहिए।
और सबसे ज़रूरी- एक ऐसा अंगूठा चाहिए जो बिना सोचे “Forward” दबा दे।
इसलिए अगली बार जब कोई संदेश आपको बताए कि वही अंतिम सत्य है, वही असली इतिहास है, वही अंतिम राष्ट्रभक्ति है, वही अंतिम धर्मरक्षा है और वही संविधान का वास्तविक अर्थ है-
तो केवल दो मिनट रुक जाइए।
स्रोत देखिए।
तथ्य जाँचिए।
पुस्तक पढ़िए।
इतिहास को अदालत मत बनाइए।
महापुरुषों को चुनावी पोस्टर मत बनाइए।
संविधान को व्हाट्सऐप नोट्स मत समझिए।
और अंत में,
अपने मोबाइल को विश्वविद्यालय बनने से पहले पुस्तकालय बनने दीजिए।
क्योंकि समाज फॉरवर्ड से नहीं, संवाद से चलता है।
लोकतंत्र ट्रोलिंग से नहीं, तर्क से मजबूत होता है।
राष्ट्र ट्रेंडिंग हैशटैग से नहीं, विश्वास से बनता है।
इतिहास वायरल संदेशों से नहीं, प्रमाणों से सुरक्षित रहता है।
जिस दिन यह बात समझ में आ गई, उसी दिन WhatsApp University का सबसे बड़ा दीक्षांत समारोह नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी हार होगी।
और शायद वही दिन सोचने वाले भारत की सबसे बड़ी जीत भी होगा।






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